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Annu jangra

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Saurya

"जीवनसाथी का चुनाव हमारे पूरे जीवन को प्रभावित करता है। सही साथी न केवल हमारे सुख-दुःख का भागीदार बनता है, बल्कि हमारे व्यक्तित्व, करियर और मानसिक शांति पर भी गहरा प्रभाव डालता है। इसलिए एक अच्छे जीवनसाथी का चयन बहुत सोच-समझकर करना चाहिए।"

kattupaya s

it's time for little nap. c u guys

Soni shakya

गम हैं कि जिंदगी में कुछ नहीं पाया मैंने, दर्द ये दिल से निकल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ.. तमन्ना फिर मचल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ.. मौसम फिर रंगीन हो जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ.. नहीं होते हो तुम तो बहुत हमदर्द होते हैं सारे हमदर्द दुर हो जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ.. दुनिया भर की झंझट, झगड़े हर बला टल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ.. - Soni shakya

kattupaya s

being hungry during jobless days was all i remember whenever I'm eating food

kattupaya s

Hope all of you enjoyed your lunch.. little late for me

M BOSS मुस्ताक अली शायर

तुमसे जुदा नहीं हूँ मैं तुमसे जुदा नहीं हूँ मैं। बस ख़ामोश सा सही हूँ मैं। तेरी हर एक याद में अब भी, धड़कन की तरह कहीं हूँ मैं। तू सामने नहीं है तो क्या, तेरे हर एहसास में ही हूँ मैं। लोग समझे बिछड़ गया हूँ तुझसे, सच ये है कि यहीं हूँ मैं। तेरे जाने का ग़म नहीं रोता, तेरे होने का यक़ीं हूँ मैं। वक़्त ने ओढ़ा दी दूरी की चादर, दिल के सबसे क़रीब वही हूँ मैं। मुस्ताक़, ये दुनिया चाहे जो कह ले, तुमसे जुदा नहीं हूँ मैं।

Kamini Shah

ક્ષણો મિલનની સંઘરી હતી જે હ્રદયમાં આજ કામ આવી ગઈ સઘળી વિરહમાં… -કામિની

Kinjal Chudasama

સવારે ઉઠી ને જેનાં મેસેજ ની રાહ જોવાતિ હોય, ત્યાજ એનો મેસેજ આવે એટલે ચેહરા ની ખુશી કંઇ અલગજ હોય.... - Kinjal

Sonam Brijwasi

बारिश ने जब पत्तों को छूकर सरगोशी की, हर बूंद ने मिट्टी से अपनी बंदगी की। एक पत्ता भीग कर चुपचाप गिर गया ज़मीन पर, जैसे किसी ने खामोशी से अपनी कहानी पूरी की। 🍃🌧️ - Sonam Brijwasi

Gautam Patel

રાંદલ માં

Deep Kumar

सपनों से हक़ीकत तक सपनों की राह में चलता रहा, हर मोड़ पर कुछ नया मिलता रहा। कुछ नया मिलने से मैं सीखता रहा, जिसमे तजुबी बड़ता रहा ।। तजुर्बा जोड़ा तो हौसला बढ़ ‌गए, सपने अब और भी चमकन लग गए। चमकने लगे तो बेहतर बन गए, जिंदगी में आनंद आ गए ।। आनंद में रंग ऐसे घुलने लगे, हर एक पल अब और प्यारे लगने लगे। प्यार से लोग हमें अपना बनाने लगे, सपनों की तलाश को हम हकीकत बनाने लगे ।। राहों में अब कोई रुकावट नहीं, सपनों के संग अब कोई भी जंग नहीं। जिंदगी की इस किताब का हर पन्ना सजा, हमने खुद को जीने का तरीका पा लिया ।।

Anup Gajare

इति: ____________________ हमारा कोई इतिहास नहीं हम खुद एक इतिहास है। ट्रेन में खडे लोग बैठे लोगों को देखते है वे भी इतिहास में लिखे जाएंगे उनका भी कोई इतिहास होगा। _____________________________

Shailesh Joshi

📢ચેતવણી✍️ માનો કે ના માનો પરંતુ આપણી સાથે કોઈ વ્યક્તિથી વિશ્વાસઘાત થવામાં મુખ્યત્વે આ બેજ કારણો જવાબદાર હોય છે, એક તો એવા વ્યક્તિ કે જેમને આપણે પૂરેપૂરા ઓળખ્યા ના હોય, અને બીજા નંબરે જે વ્યક્તિ આવે છે, એ એવા હોય છે કે જેમણે આપણને પૂરેપૂરા અને સારામાં સારી રીતે ઓળખી લીધા હોય છે. સમજાય એને વંદન, અને ના સમજાય એને વિનંતી

kattupaya s

Good afternoon friends.. have a nice afternoon

Shailesh Joshi

આપણને નહીં મળવાવાળી મદદમાંથી 90 ટકા + મદદ નહીં મળવાનું કારણ આપણો સ્વભાવ હોય છે, પછી આ વાત માનવી કે ના માનવી એ પણ આપણા દરેકના અલગ અલગ સ્વભાવ પર જાય છે. - Shailesh Joshi

Nasim Fatima

tumse apna rabt purana gham se gehri yari Hai jitne bhi hain jaan k dushman sabse rishtedari Hai pyas ki Farhat tum kya jano logon pyas ke sehra mein tumne do din Kate honge humne umr guzari Hai.

Saroj Prajapati

आज फिर चला यादों का काफ़िला जाने कितनी दूर तलक तक जाएगा आज फिर सारी रात कटेगी आंखों में जाने कितना भूला बिसरा फिर याद आएगा। सरोज प्रजापति ✍️ - Saroj Prajapati

Anup Gajare

खामोशी की सज़ा. _________________ घर में कोई बुज़ुर्ग नहीं था जो कह देता— “इतना काफ़ी है, अब रुक जाओ।” जो हुआ वह कम नहीं था, और जो मेरे लिए किया गया वह वजह के बहुत पास था— इतना पास कि दोष और दया एक-दूसरे से गले मिल बैठे। मैं पूछता रहा— क्या था ये? क्यों किया मैंने? और मेरी खामोशी सारे जवाब खा गई। अगर कोई मुझे उकसाता, तो मेरे तन में लगी आग मैं खुद ही बुझा देता— पर आग को बुझाना भी क्या गुनाह होता है? क्या ये नसीब था या बस मेरा होना न होने के बराबर? इसने मुझे बदल दिया। आख़िरी उम्मीद का दिया बुझ गया— पर राख में हाथ डालकर मैं फिर उसे जलाऊँगा, क्योंकि राख मेरी नाकामयाबी नहीं मेरी आख़िरी उम्मीद है। किसने मारा मुझे? मैं तो ज़िंदा हूँ— फिर भी अंदर कुछ मर चुका है। जिसने मेरे लिए कुछ किया, उसका अहसान मैं पूरा न चुका सका— शायद इसलिए थकान अब मेरी पहचान बन गई है। क्या मुझे अभी मर जाना चाहिए और बुझते हुए लिखते रहना चाहिए? मैंने कभी किसी को नहीं मारा, फिर ये सब मेरे साथ क्यों? क्या मैं इंसान नहीं? क्या मेरी भावनाएँ गिनती में नहीं आतीं? मैं भी रास्ते काटता हूँ— पर जिसने मुझे तोड़ा उसके साथ क्या हुआ? किसने उसे छोड़ा? ढेर सारे नक्शे बुझ गए— मेरी तरह। क्या कोई फर्क नहीं पड़ता? क्या लिखना माफी नहीं हो सकता? क्या मैं गलती नहीं कर सकता? मैं भी इंसान हूँ— क्या उसने ये नहीं सोचा कि किसलिए मुझे मारा जा रहा है? मैं खामोशी की सज़ा में बँधा हूँ। किसने उसे उकसाया कि वह मारते-मारते और उद्विक्त हो गया? उसके शब्दों में जादू था— लब्जो में अल्फ़ाज़ नहीं, बस मैं था— और मैं ही काफ़ी था टूटने के लिए। ये मुझे छोड़ता नहीं— कभी नहीं छोड़ेगा। फिर मैं फ़िक्र क्यों करूँ उसकी जो अब है ही नहीं? जीना क्या जीवन से हार के फासले तय करना नहीं होता? दुःख के रास्ते पर जो फूल खिला है— उसका स्वाद कितना कड़वा होता है, क्या तुमने चखा है? मैं मासूम नहीं कि फिर से जुड़ जाऊँ। यह फैसला किसी और के लिए होगा— मेरे लिए ये ठहराव था। इसने मुझे सिखाया कि ज़रूरत कभी जीवन से बड़ी नहीं होती। पर ये भी भूल गया कि कभी मैं भी था। मैं जो हूँ— उसका स्वाद वह कबका चख चुका है। उसकी अंतिम इच्छा मैं नहीं जानता— पर जब तक मैं हूँ, मेरे पास कुछ नहीं होना चाहिए। क्या उसके चलते मैं रुक जाऊँ? हरगिज़ नहीं। कब तक सीखूँ कि मर कर न मरना भी मरना ही होता है? काफ़िर ज़िंदगी कितनी मुश्किल है— जब किसी के पास अब कुछ नहीं बचता सिवाय उसके। _____________________________________

silent Shivani

Manifestation is not magic. It’s not about wishing and waiting. It’s about clear intention, consistent effort, and trusting yourself even when things feel slow. What you work for, you slowly attract.

Shailesh Joshi

જેનાં મન અને મોઢાની વાત એક હોય, એના જીવનમાં ખુશીયો અનેક હોય, ને કોઈવાર આવી પડે કોઈ ઓચિંતું દુ:ખ, તો એમાંથી નીકળવાના, રસ્તા પણ અનેક હોય. - Shailesh Joshi

nidhi mishra

Gulab Ka Sabak Ek gulab ne mujhse kaha, tu kyun darti hai kaanton se, Zindagi ki asli pehchan hoti hai, inhi imtihanon se. Dekh mera surkh rang, ye junoon ki nishani hai, Par in kaanton ke beech hi, meri har kahani hai. Log kehte hain gulab ho toh kaante bhi jhelne honge, Par main kehti hoon, kaante hi toh humein ladna sikhate hain. Bina kaanton ke toh phool bhi murjha jaye jaldi, Ye chubhan hi toh hai, jo jeene ka jazba jagate hain. Maana ki raahon mein kaante bichhe hain hazaar, Par tu dekh us khushbu ko, jo hai behisaab aur apaar. Gulab tabhi banta hai, jab dhoop aur tufaan se ladta hai, Insaan bhi wahi hai, jo mushkilon mein hi nikharta hai. Tu ban ja wahi gulab, jo har haal mein muskuraye, Chahe kismat kitne bhi kaante, teri raah mein bichhaye. Kaante teri hifazat hain, teri kamzori nahi, Teri jeet ki dastaan mein, ye rukawat koi nahi!

Dada Bhagwan

Do You Know people praise and speak very highly of those who donate money? This public adoration is the donor's reward. The donor reaps the reward of his action in this very life, whereas the one who gives anonymously will reap his reward in his next life. Read more on: https://dbf.adalaj.org/J8hBTnYs #humanity #donation #charity #helpothers #DadaBhagwanFoundation

Zakhmi Dil AashiQ Sulagte Alfaz

🦋...𝕊𝕦ℕ𝕠 ┤_★__ एक खत ऐसा भी... तारीख: आज की एक अकेली शाम, पता: मन का वो कोना, जहाँ कोई झाँकता नहीं, सुनो, उम्मीद है तुम बाहर से ठीक होगे क्योंकि आजकल हम सबने ठीक होने का एक बेहतरीन हुनर सीख लिया है, आज दिल कुछ भारी था, तो सोचा तुम्हें वो बातें लिखूँ जो हम महफिलों में हँसते हुए भी नहीं कह पाते, तुमने सच ही तो कहा था, यहाँ हर कोई अपना ज़ख्म छिपाए फिर रहा है, हम सब एक ऐसे मेले में हैं जहाँ भीड़ तो बहुत है, पर हर इंसान अपनी अधूरी कहानी का अकेला किरदार है, हम एक-दूसरे को तसल्ली तो देते हैं पर सच तो ये है कि हम खुद अपनी थकान से चूर हैं, ये जो चेहरे पर मुस्कान हम चिपकाए रखते हैं न, वो दरअसल एक ढाल है ताकि कोई हमारी असुरक्षा को देखकर हमें कमज़ोर न करार दे दे, हम उस समाज का हिस्सा हैं जहाँ टूटना मना है और हारना उससे भी बड़ा गुनाह, कितना अजीब है न,? हम जानते हैं कि कोई किसी का बोझ नहीं उठा सकता, फिर भी एक उम्मीद की डोर पकड़े बैठे हैं, शायद वो झूठी उम्मीद ही है जो हमें रोज़ सुबह बिस्तर से उठाती है और रात को थपकियाँ देकर सुला देती है, हम एक-दूसरे पर तंज कसते हैं अपनी कुंठाएँ थोपते हैं, सिर्फ इसलिए ताकि खुद को बेकार होने के एहसास से बचा सकें, भीतर एक शोर है जो कभी थमता नहीं और बाहर एक सन्नाटा है जिसे हम नॉर्मल कहते हैं, हम रोज़ हारते हैं, रोज़ टूटते हैं, और फिर अगले दिन एक नया मुखौटा पहन कर दुनिया के सामने खड़े हो जाते हैं, सिर्फ ये दिखाने के लिए कि हम मज़बूत हैं, पर कभी-कभी सोचता हूँ... कब तक,? खैर, ये खत बस एक ठहराव था, उन चंद लम्हों की गुफ्तगू जो शायद तुम्हारे घाव तो नहीं भरेगी, पर तुम्हें ये ज़रूर महसूस कराएगी कि इस अंधेरे में तुम अकेले नहीं हो, हम सब अपनी अपनी हार को ठीक है कहकर ढो रहे हैं, अपना ख्याल रखना तुम्हारा ही एक अक्स,,🥀🔥 ╭─❀💔༻  ╨──────────━❥ ♦❙❙➛ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी•❙❙♦  #LoVeAaShiQ_SinGh☜ ╨──────────━❥

Saliil Upadhyay

सबकी जिंदगी के पेपर अलग हैं....! कृपया नकल ना करे...! - Saliil Upadhyay

Aradhana

चाहत तो थी मंजिल कि... पर सफर में कुछ छूटा था, पाना तो सब कुछ था , पर बाकी कुछ तो था । चाहत तो थी मंजिल कि ... पर खोया तो सब कुछ था, मिला तो सब कुछ था, सोचा तो .... मिला तो कुछ भी न था । ।

Manish Patel

તણખલા જેવડો પણ ઉપકાર કરવા મળે તો કરી લેવો, કેમ કે એના ફળ તાડ જેટલા મોટા હોય છે - Manish Patel

Deepak Bundela Arymoulik

हर रास्ता मंज़िल तक नहीं जाता, कुछ रास्ते सिर्फ़ यह सिखाने आते हैं कि लौटना भी एक कला है। हर सवाल जवाब नहीं माँगता, कुछ सवाल अंदर बैठकर हमें चुप रहना सिखाते हैं। जो बहुत साफ़ दिखता है वही सबसे पहले धोखा देता है, और जो धुंधला है वही अक्सर सच की तरफ़ इशारा करता है। हर जीत ताली की आवाज़ नहीं होती, कुछ जीतें अकेले कमरे में आँखें बंद कर महसूस की जाती हैं। समय जब जवाब नहीं देता तो समझ लो— वह हमें ख़ुद से मिलाने में लगा हुआ है। आर्यमौलिक

Imaran

मेरे कलम से लफ्ज़ खो गए सायद आज वो भी बेवफा हो गाए सायद जब नींद खुली तो पलकों में पानी था मेरे ख्वाब मुझपे रो गाए सायद. 🥲imran 🥲

S A Y R I K I N G

जिसको होठों से लेते है उसको चुम्मा कहते है आपको शर्म नहीं आती आप शादी सुधा हो कर हम पे लाइन मारती हो 4 बच्चों की अम्मा

S A Y R I K I N G

एक कामयाब शायरी की आशिक़ी है तू लफ्ज़ तू ख्याल तू सोच तू good morning good night तू सुबह के नाश्ता चाय तू रात का Denar तू मेरी सबसे बड़ी कामयाबी की कलम तू मोहब्बत तू इश्क़ तू प्यार तू जान तू मेरा हर ख्याल तू तू ही तू

S A Y R I K I N G

तू नहीं तो, तेरा ख़याल ही सही कोई तो मेरा हमख़याल है... सब कुछ तो है बस एक ही कमी है तू तू तू

S A Y R I K I N G

जैसी करनी वैसी भरनी आज एक शख्स ने फटा नोट दे कर आधा किलो दूध लिया घर जा कर दूध उबाला तो दूध भी फट गया

Roshan baiplawat

new emotional shayari 💔🥀😥

Sakshi Sunil Rane

काही बदल स्वतःसाठी चांगले असतात…😇

Mahesh Gadhvi

હે નારી હે સન્નારી જીવન તારું હવાનકુંડ ને કર્મ છે તારી આહુતિ ધૈર્ય તારો બળતો દીપક ને સહનશીલતા ની વાટ વણી તે અર્ધ્ય આપ્યું તે જીવન નું જાત ને આખી હોમી ને . સર્વ ને આશિષ આપ્યા તે જે બેઠા તુજ સમીપે છે. તે સર્વનું જીવન બદલ્યું છે જીવન તારું નીચોવી ને. રચી દુનિયા તુજ ઉદર થી ને વાણી થી વૈભવ ભર્યા. ઘર સંસાર ને ધન ભંડાર સદૈવ તુજ થી ભરતા રહ્યા. તુ સંચાર બની છે શક્તિ નો ભલે અબળા તુને ગણતા રહ્યા. માં,બહેન ને ભાર્યા રૂપે આશ તને જગત નિજ પૂજતા રહ્યા. "કવિ આશ " મહેશ ગઢવી પોલીસ ઇન્સ્પેક્ટર ગુજરાત

Mahesh Gadhvi

औरत नहीं बनना चाहेगी दोबारा किसी भी जन्म में औरत क्योंकि थका चुके हैं उसे ये समझौते जो उसकी परछाई बने बैठे हैं ये निरंतन खेले जाने वाले झूठे खेल जो उसकी संवेदना को डस रहे है। ये संस्कार की मूरत का लेप, ये सहनशक्ति का महिमा मंडन। जो हमेशा उसको मृत्यु के कगार पर ले गए । थक चुकी है वो इन से ऊब चुकी है उनसे, जिसके साथ वो चली कंधा मिलाकर, जिसके साथ सांस फूलते हुए भी वो दौड़ी वे ही ले गए उसे अग्नि परीक्षा में,। वे ही ले गए उसे निर्लज्ज सभा में। सदैव उपेक्षित एक ही जीवन, आशा की अपेक्षा में उपेक्षा की आशा में औरत फिर नहीं बनना चाहेगी दोबारा किसी भी जन्म में औरत। "कवि आश" महेश गढ़वी पुलिस इंस्पेक्टर गुजरात

Mahesh Gadhvi

अब तो तुम आदत हो खाकी। मेरी हर नब्ज में घुली हो खून की तरह। तुम ही तो जज्बात हो खाकी। मेरी हर विजयमें शामिल हो गर्वकी तरह। तुम शान हो मेरी खाकी। मेरी हर धड़कनमें दौड़ती हो सांसोंकी तरह। अक्सर शामिल होती है आदतें जीवन में पर तुम शामिल हो जीवन की आदतों में। में कैसे कहूं  खाकी की तुम आदत हो , और कैसे कहूं की बिना आदत का जीवन हो तुम। सच कहूं ख़ाखी ! अब तुम वो आदत हो जिससे जीवन है। धूप हो या छांव दिन हो या रात , इन रंगबिरंगे जहां में एक ही रंग हो तुम। जो भाया मुझे, जो दे छाया मुझे । जिसने निर्भिक बनाया मुझे । जिसने सिखाया मुझे बेतरतीब को तरतीब में लाना, आंखों से आंखे मिलाना, और तेवर से ही औकात दिखाना । ऐसे ही कहां मिली हो तुम । धूल मिट्टी पसीने से सिली हो तुम। गिरेबान में झांके वे जो बन रहे बेलगाम हैं। ऐसे ही घोड़ों पर करते हम सवार हैं। खाकी है हम आश बस इतना ही काफी है। खाकी है हम काफी है हम। "कवि आश" महेश गढ़वी

kattupaya s

Lot of people like"iravai sudum velicham" "இரவை சுடும் வெளிச்சம் "novel.but no reviews. quite surprising. if you have free time pls read the novel and put some reviews.

kattupaya s

Once again I wish to inform all my ebooks available@google play books. if you are interested pls go through.

Dr Darshita Babubhai Shah

मैं और मेरे अह्सास चाहत की इंतिहा का असर देख लो l अब थोड़ा दर्दों से फ़ासला लगता हैं ll ये जो ग़म के बादल छाए हुए थे वो l नन्ही गलती का मसअला लगता हैं ll "सखी" डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

kattupaya s

Filter coffee for..

kattupaya s

Enjoy the Tea

kattupaya s

Time for some good breakfast..

kajal jha

खामोशी से सहते रहे हम हर जख़्म, कभी शिकायत की आदत नहीं थी। तुम क्या जानो टूटने का दर्द, हँसते चेहरे के पीछे कितनी चीख़ें थीं। - kajal jha

kattupaya s

your content that may people will not like immediately. don't force or get dejected. a good content takes its own time. even after 10 years some great writers books are not sold. try your best spend time on quality content

Shefali

#shabdone_sarname__

kattupaya s

what is professional writing?...iam also too young to write about this. a clean and right approach towards readers. honesty in your content.thats enough for healthy writing.

kattupaya s

regular income is not possible for begginers who choose writing as proffession. but your words may help the younger generation and current generation. think before writing something. it is easy to be a writer nowadays.at the seme time they don't have any commitment towards good writing. iam not blaming anyone. try to be more professional that's my request

kattupaya s

it's another beautiful day friends.. hope we will utlize it for our future. usually I didn't care about future. but nowadays it is necessary to secure the future of our family and need to plan everything. mm it's too much but the future in only paper will not help. family is the key for future.

GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

चलो जगत में इस तरह, ज्यों चलता गजराज। जीर्ण शीर्ण यदि दिखोगे, बिगड़ेगा सब काज।। दोहा --३९३ (नैश के दोहे से उद्धृत) -----गणेश तिवारी 'नैश'

Gajendra Kudmate

मीलते हैं लोंग राहों में किसी मुसाफ़िर की तरह दे जाते हैं तौफ़ा उम्रभर का किसी बेनज़ीर की तरह गजेंद्र

kattupaya s

Good morning friends.. have a great day

Prithvi Nokwal

माँ, तू अब नहीं है मेरे सामने, पर तेरी सीखें और दुआएँ हैं मेरे साथ। तेरी यादें बन गई हैं मेरी ताकत, तेरी ममता की छाया रहेगी सदा मेरे जीवन में।

Sonu Kumar

*क्यों चुनावो में पार्टी के उम्मीदवारों को ही विजय मिलती है और योग्य होने के बावजूद निर्दलीय प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो जाती है, और कैसे यह व्यवस्था लोकतंत्र का गला दबाकर राजनीति में कुछ परिवारों का दबदबा बनाए रखती है, और कैसे इस समस्या को हल किया जा सकता है ?* . ==== . चुनावो की तारीख घोषित होने से लेकर प्रचार करने और मतदान होने तक की सारी प्रक्रियाएं लगभग एक माह के भीतर पूर्ण हो जाती है। मतदान के लिए सिर्फ एक दिन का वक्त होता है। आपको जो कुछ भी करना है इन कुछ दिनों में ही करना होता है। पार्टियो के पास संगठन होता है, सभी वार्डो, मुहल्लों, गाँवों, तहसीलों आदि में कार्यकर्ता होते है, और खर्च करने के लिए बेतहाशा रुपया होता है। इस तरह से इस तेज गति की दौड़ में बढ़त बना लेने के लिए उनके पास पर्याप्त संसाधन होते है। उन्हें सिर्फ टिकेट लाना होता है। एक बार यदि टिकेट मिल जाए तो पार्टी के ये सभी संसाधन उसके हो जाते है। इस तरह से कोई नामालूम, निकम्मा, कमीना, भ्रष्ट और आपराधिक छवि का व्यक्ति भी अगर टिकेट ले आता है तो वह बिना कुछ किये ही चुनावी जीत का दावेदार हो जाता है। . जबकि किसी स्वतंत्र उम्मीदवार के पास इतना बड़ा सांगठनिक ढांचा, कार्यकर्ता और चुनाव लड़ने के लिए पैसा नहीं होता। और इतने कम समय में वह कितनी भी मेहनत करके इन्हें जुटा भी नहीं पाता है। इस तरह से संसाधन विहीन स्वतंत्र उम्मीदवार के लिए बराबर के मुकाबले के अवसर समाप्त हो जाते है। गुटबंदी और पैसा देकर प्रत्याशी टिकेट ले आते है और मतदाताओ को बाध्य होकर इन्हें ही चुनना होता है। . समस्या -- चुनाव प्रचार के लिए समय की कमी होने और मतदान के लिए सिर्फ एक दिन तय होने के कारण पूरी शक्ति प्रचार में झोंकनी होती है। सिर्फ इसी कारण से संसाधन युक्त पार्टी के उम्मीदवार अपनी बढ़त बना लेते है, और योग्य होने के बावजूद निर्दलीय उम्मीदवार पिछड़ जाते है। यदि निर्दलीय उम्मीदवार पार्टी खड़ी करने पर काम करेंगे तो उन्हें दशको लग जाएंगे। . ===== . समाधान : . १) मतदान अवधि की सीमा बढ़ाना --- यदि मतदान को 365 दिनों और 5 वर्ष के लिए खोल दिया जाए तो स्थिति पलट जायेगी। इससे कम संसाधन होने के बावजूद निर्दलीय उम्मीदवार बिना किसी संगठन के भी धीमे धीमे अपना प्रचार करते रह सकते है। इससे उनके पास मतदाताओ तक पहुँचने के लिए पर्याप्त अवसर रहेगा। जब भी कोई मतदाता किसी उम्मीदवार से सहमत होता है, वह अपनी इच्छा से तब उसे वोट कर सकेगा। इस तरह से चुनाव पार्ट टाइम गतिविधि बन जायेगी और उम्मीदवारों को हड़बड़ी में अपने संसाधन नहीं झोंकने पड़ेंगे। . २) जिस तरह बैंक अपना काउंटर लेकर रोज हमारे मोहल्ले में आकर नहीं कहता कि आज कि आज अपना पैसा निकालो या जमा कराओ, और फिर अगले 5 वर्ष तक किसी प्रकार का लेनदेन नहीं होगा, उसी तरह से मतदान में भी ऐसा नहीं होना चाहिए। हमें ऐसी प्रक्रिया लागू करनी चाहिए जिससे जिस व्यक्ति के पास जब समय हो वो उस समय पटवारी कार्यालय या कलेक्ट्री में जाकर अपना वोटर कार्ड दिखाकर अपना वोट दे सके। इस व्यवस्था के आने से चुनाव आयोग को मतदान के लिए अपनी भारी भरकम मशीनरी नहीं लगानी होगी, तथा चुनावो का खर्च बच जाएगा। . ३) वोट वापिस लेने का अधिकार --- कई बार मतदाता धुँवाधार प्रचार की चपेट में आकर गलत उम्मीदवार चुन लेते है। लेकिन उनके पास अपना वोट बदल लेने का कोई मौका नहीं होता। किसी भी समय वोट करने के साथ ही मतदाता को अपना वोट बदलने का अधिकार भी दिया जाना चाहिए। यदि किसी जनप्रतिनिधि के के मतों में एक निश्चित प्रतिशत से अधिक गिरावट दर्ज की जाए व किसी अन्य उम्मीदवार को एक वर्तमान प्रतिनिधि से अधिक मत मिल जाए तो अधिक मत वाला उम्मीदवार पद ग्रहण कर लेगा। इस व्यवस्था से मौजूदा प्रतिनिधियों पर लगातार अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव बना रहेगा। #वोट_वापसी_पासबुक #जूरी_कोर्ट . ________________ हमारे आंदोलन से जुड़ने ,आंदोलन के कार्यकर्ता बनने के लिए 98877 42837 पर संपर्क कर सकते हैं l

Sanket Gawande

उलझनों में फँसा मुसाफ़िर था, रास्ता न मिला... चीख़ता रहा दुनिया से, पर अपना ही साया न मिला.... खुद को साबित करता रहा हर एक मोड़ पे, हर जगह.... लोग मिले बहुत से मगर दिल का हमसाया न मिला.... दर्द की आग में जलता रहा मैं हर एक रोज़.... तकलीफ़ों से लड़ते-लड़ते कोई सहारा न मिला.... भीतर ही भीतर बिखरता रहा ख़ामोशी के साथ.... हँसता रहा चेहरों में, पर मन का साया न मिला.... फिर धैर्य का हाथ थामा, मन को ठहरने दिया.... चुप रहना सीखा जब शोर में कुछ फायदा न मिला... ना हर किसी को जवाब दिया, ना खुद को साबित किया.... जो सुकून चारों ओर ढूँढा, वो बाहर न मिला.... आख़िर झुककर देखा जब अपने ही अंदर “ये मुसाफ़िर”... जिसे उम्र भर खोजता रह दर बदर, वही खुद में ही मिला..... –संकेत गावंडे .

Payal Author

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Soni shakya

सब सो गए और मैं, अब भी अटकी हूं तुझमें..!! 🍁🍁 - Soni shakya

Soni shakya

राते चुप है और..! यादें शोर मचा रही है..!! - Soni shakya

S A Y R I K I N G

देख कर उसको अक्सर ये ख्याल आता हैं काश शादी न हुई होती तो क्या होता

MOU DUTTA

তোমার চোখের কাজল নাকি আমার চোখের জল, কে ছিল প্রিয় আজও জানি না যে তা। সত্য যদি প্রকাশ হয় তবে ছলনা ভালোবাসা, যে বাসা তে হারিয়ে গেছে আমার সুখে থাকা। হয়তো তুমি পূর্ণ চোখে চেয়ে আছো আজ আমি আজ শূন্য মনে ফিরে গেছি থাক। তবু চোখে আছে শুধু তোমার জন্য আশা যে আশা তে শেষ হয় গো আমার ভালোবাসা। শুধু আজ তুমি ছাড়া এসবই নিরাশা। মৌ 🖋️

Raju kumar Chaudhary

न्याय की प्रतीक्षा में निर्मला “माँ, होमवर्क करके जल्दी लौट आऊँगी।” निर्मला ने अपने दोस्तों के लिए छोटे से प्लास्टिक में कुछ अमरूद बाँधे, अपनी पुरानी साइकिल निकाली और मुस्कुराते हुए घर के आँगन से निकल गई। दिन ढल गया। शाम हो गई। लेकिन निर्मला नहीं लौटी। बम दीदी-बहन के घर से दोपहर 2 बजे ही निकल चुकी निर्मला, शाम 8 बजे तक भी घर नहीं पहुँची। घबराए हुए माता-पिता पुलिस चौकी पहुँचे। वहीं उन्हें राज्य से पहला धोखा मिला। “किसी लड़के के साथ चली गई होगी, घूम रही होगी।” अपनी बेटी के लापता होने की पीड़ा से तड़पते माता-पिता पर वर्दीधारी रक्षकों की यह असंवेदनशील टिप्पणी थी। अगर उसी रात तुरंत खोज अभियान शुरू हो जाता, तो शायद इस कहानी का अंत कुछ और होता। अगली सुबह— 11 साउन। घर से कुछ ही दूरी पर गन्ने के खेत में निर्मला का निर्जीव शरीर मिला। उस दृश्य ने सिर्फ इंसानों को नहीं, बल्कि मानवता को भी झकझोर दिया। लेकिन उस भयावह घटना से भी ज़्यादा डरावना दृश्य इसके बाद देखने को मिला। अपराध जांच में घटनास्थल को ‘मंदिर’ माना जाता है, लेकिन यहाँ रक्षक ही भक्षक के साथी बन गए। एक मासूम बच्ची के शव के पास मिली सलवार— जो बलात्कार का सबसे अहम सबूत हो सकती थी— पुलिस ने खुद पानी में धो दी। क्या यह सिर्फ अज्ञानता थी? या किसी के गुनाह धोने की सुनियोजित साज़िश? भीड़ इकट्ठा हुई। निर्मला की साइकिल, कॉपी-किताबें शव से कुछ दूरी पर बिखरी पड़ी थीं। लेकिन संघर्ष का कोई निशान नहीं था। मानो हत्या कहीं और करके शव यहाँ सजा दिया गया हो। सबूत मिटाने की जल्दबाज़ी में फॉरेंसिक टीम के पहुँचने से पहले ही शव हटा दिया गया। सच्चाई हमेशा के लिए उसी गन्ने के खेत की मिट्टी में दबा दी गई। जन आक्रोश बढ़ता गया। राज्य ने एक ‘पात्र’ खड़ा किया— दिलीप सिंह बिष्ट। 41 वर्षीय मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति। पुलिस ने तैयार की हुई पटकथा सुनाई— “इसी ने निर्मला की हत्या की है।” सबूत के नाम पर उसकी फटी हुई कमीज़ दिखाई गई। बाद में बंद कमरे के भीतर की सच्चाई सामने आई— “इस अपराध को स्वीकार कर ले, हम तुझे मांस और शराब देंगे, नहीं तो मार देंगे।” एक मानसिक रोगी पर किया गया यह अत्याचार न्याय प्रणाली के चेहरे पर लगा काला धब्बा था। लेकिन झूठ की उम्र लंबी नहीं होती। निर्मला के शरीर से लिए गए (चाहे जितने भी विवादित क्यों न हों) डीएनए नमूने दिलीप के डीएनए से नहीं मिले। विज्ञान ने राज्य के झूठ को मानने से इनकार कर दिया। एक निर्दोष बच गया, लेकिन असली अपराधी आज भी पर्दे के पीछे मुस्कुराता रहा। निर्मला के लिए न्याय माँगते ही सड़कें आग बन गईं। पूरा देश रो पड़ा। कंचनपुर की सड़कों पर नारे गूँजे— “सरकार, निर्मला को न्याय दो!” लेकिन सरकार ने न्याय की जगह गोलियाँ चलाईं। 8 भदौ। 17 वर्षीय सन्नी— निर्मला के लिए न्याय माँगने सड़क पर उतरा एक किशोर— पुलिस की गोली से गिर पड़ा। एक हत्या की जाँच करनी थी, राज्य ने जवाब में एक और हत्या कर दी। आज वर्षों बीत चुके हैं। घटनास्थल के पास की सेना की बैरक, बम दीदी-बहन का घर, बार-बार बदले गए बयान, घटना के तुरंत बाद रंगे गए कमरे, सलवार धोने वाले पुलिसकर्मी और शक के घेरे में खड़े ‘वीआईपी’ चेहरे— सब आज भी रहस्य के गर्भ में हैं। निर्मला के पिता यज्ञराज पंत— न्याय माँगते-माँगते मानसिक रूप से टूट चुके हैं। माँ दुर्गा देवी— राज्य से लड़ते-लड़ते अंततः हार मानने को मजबूर हो गईं। इस कहानी का अंत अभी लिखा जाना बाकी है। निर्मला का हत्यारा आज भी आज़ाद घूम रहा है। उसके नाम पर कार्यक्रम चलाने वाले मंत्री बने, प्रधानमंत्री बदले, कानून मंत्री, आईजीपी, डीआईजी— सब बदल गए। लेकिन एक सच्चाई आज भी नहीं बदली— “निर्मला की आत्मा को अब तक शांति नहीं मिली है।” निर्मला पंत को हार्दिक श्रद्धांजलिउखुबारीले देखेको सत्य “आमा, म छिट्टै फर्किन्छु” भन्दै निस्किएकी एउटी छोरी घर फर्किन पाइन। साँझ ढल्दै गयो, आकाश रातो भयो, आमाको मन रातभन्दा गहिरो अन्धकार बन्यो। चौकीको ढोकामा आँसु लिएर उभिँदा राज्यले भन्यो— “केटासँग होली।” त्यही रात न्याय निदायो, र अर्को बिहान उखुबारी रोयो। सानो साइकल, कापी–कलम, र च्यातिएको सपना माटोमा छरपस्ट। प्रमाण पखालियो पानीले, पाप पखालियो कि सत्य डुबाइयो? उखुबारी जान्दछ। एउटा निर्दोष बालिका, अर्को मानसिक रोगी, र बीचमा राज्यको झूट। विज्ञान चिच्यायो— “ऊ अपराधी होइन!” तर हत्यारा भीआईपी मुस्कानमा हरायो। न्याय माग्दा सडक आगो बन्यो, र न्यायकै नाममा गोली चल्यो। सन्नी ढल्यो, १७ वर्षको सपना रगतमा मिसियो, राज्य फेरि मौन भयो। बुबाको आवाज सडकमा गल्दै गयो, आमाको आँसु थाकेर रोकियो। मन्त्री फेरिए, कुर्सी सरे, तर एउटी छोरीको न्याय अड्कियो। आज पनि उखुबारी माटोमुनि सत्य बोकेर चुपचाप उभिएको छ। र देशले सुन्न नसकेको एउटा आवाज अझै गुञ्जिन्छ— “म निर्मला हुँ, मलाई न्याय चाहिन्छ।https://youtube.com/@rajufilmyjunction?si=cCmXX87Yn7XPtlu

Raju kumar Chaudhary

न्याय की प्रतीक्षा में निर्मला “माँ, होमवर्क करके जल्दी लौट आऊँगी।” निर्मला ने अपने दोस्तों के लिए छोटे से प्लास्टिक में कुछ अमरूद बाँधे, अपनी पुरानी साइकिल निकाली और मुस्कुराते हुए घर के आँगन से निकल गई। दिन ढल गया। शाम हो गई। लेकिन निर्मला नहीं लौटी। बम दीदी-बहन के घर से दोपहर 2 बजे ही निकल चुकी निर्मला, शाम 8 बजे तक भी घर नहीं पहुँची। घबराए हुए माता-पिता पुलिस चौकी पहुँचे। वहीं उन्हें राज्य से पहला धोखा मिला। “किसी लड़के के साथ चली गई होगी, घूम रही होगी।” अपनी बेटी के लापता होने की पीड़ा से तड़पते माता-पिता पर वर्दीधारी रक्षकों की यह असंवेदनशील टिप्पणी थी। अगर उसी रात तुरंत खोज अभियान शुरू हो जाता, तो शायद इस कहानी का अंत कुछ और होता। अगली सुबह— 11 साउन। घर से कुछ ही दूरी पर गन्ने के खेत में निर्मला का निर्जीव शरीर मिला। उस दृश्य ने सिर्फ इंसानों को नहीं, बल्कि मानवता को भी झकझोर दिया। लेकिन उस भयावह घटना से भी ज़्यादा डरावना दृश्य इसके बाद देखने को मिला। अपराध जांच में घटनास्थल को ‘मंदिर’ माना जाता है, लेकिन यहाँ रक्षक ही भक्षक के साथी बन गए। एक मासूम बच्ची के शव के पास मिली सलवार— जो बलात्कार का सबसे अहम सबूत हो सकती थी— पुलिस ने खुद पानी में धो दी। क्या यह सिर्फ अज्ञानता थी? या किसी के गुनाह धोने की सुनियोजित साज़िश? भीड़ इकट्ठा हुई। निर्मला की साइकिल, कॉपी-किताबें शव से कुछ दूरी पर बिखरी पड़ी थीं। लेकिन संघर्ष का कोई निशान नहीं था। मानो हत्या कहीं और करके शव यहाँ सजा दिया गया हो। सबूत मिटाने की जल्दबाज़ी में फॉरेंसिक टीम के पहुँचने से पहले ही शव हटा दिया गया। सच्चाई हमेशा के लिए उसी गन्ने के खेत की मिट्टी में दबा दी गई। जन आक्रोश बढ़ता गया। राज्य ने एक ‘पात्र’ खड़ा किया— दिलीप सिंह बिष्ट। 41 वर्षीय मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति। पुलिस ने तैयार की हुई पटकथा सुनाई— “इसी ने निर्मला की हत्या की है।” सबूत के नाम पर उसकी फटी हुई कमीज़ दिखाई गई। बाद में बंद कमरे के भीतर की सच्चाई सामने आई— “इस अपराध को स्वीकार कर ले, हम तुझे मांस और शराब देंगे, नहीं तो मार देंगे।” एक मानसिक रोगी पर किया गया यह अत्याचार न्याय प्रणाली के चेहरे पर लगा काला धब्बा था। लेकिन झूठ की उम्र लंबी नहीं होती। निर्मला के शरीर से लिए गए (चाहे जितने भी विवादित क्यों न हों) डीएनए नमूने दिलीप के डीएनए से नहीं मिले। विज्ञान ने राज्य के झूठ को मानने से इनकार कर दिया। एक निर्दोष बच गया, लेकिन असली अपराधी आज भी पर्दे के पीछे मुस्कुराता रहा। निर्मला के लिए न्याय माँगते ही सड़कें आग बन गईं। पूरा देश रो पड़ा। कंचनपुर की सड़कों पर नारे गूँजे— “सरकार, निर्मला को न्याय दो!” लेकिन सरकार ने न्याय की जगह गोलियाँ चलाईं। 8 भदौ। 17 वर्षीय सन्नी— निर्मला के लिए न्याय माँगने सड़क पर उतरा एक किशोर— पुलिस की गोली से गिर पड़ा। एक हत्या की जाँच करनी थी, राज्य ने जवाब में एक और हत्या कर दी। आज वर्षों बीत चुके हैं। घटनास्थल के पास की सेना की बैरक, बम दीदी-बहन का घर, बार-बार बदले गए बयान, घटना के तुरंत बाद रंगे गए कमरे, सलवार धोने वाले पुलिसकर्मी और शक के घेरे में खड़े ‘वीआईपी’ चेहरे— सब आज भी रहस्य के गर्भ में हैं। निर्मला के पिता यज्ञराज पंत— न्याय माँगते-माँगते मानसिक रूप से टूट चुके हैं। माँ दुर्गा देवी— राज्य से लड़ते-लड़ते अंततः हार मानने को मजबूर हो गईं। इस कहानी का अंत अभी लिखा जाना बाकी है। निर्मला का हत्यारा आज भी आज़ाद घूम रहा है। उसके नाम पर कार्यक्रम चलाने वाले मंत्री बने, प्रधानमंत्री बदले, कानून मंत्री, आईजीपी, डीआईजी— सब बदल गए। लेकिन एक सच्चाई आज भी नहीं बदली— “निर्मला की आत्मा को अब तक शांति नहीं मिली है।” निर्मला पंत को हार्दिक श्रद्धांजलि

Himanshu Shukla

पहला प्यार कभी भुलाया नहीं जाता… 💔 कुछ एहसास अधूरे रह जाते हैं, और वही ज़िंदगी भर याद बन जाते हैं। 📖 “पहला प्यार : अनकहा एहसास (Part-1)” आ चुका है। ❤️ अगर आपने भी कभी चुपचाप किसी से प्यार किया है, तो ये कहानी आपके दिल को छू जाएगी…

Raju kumar Chaudhary

न्यायको पर्खाइमा निर्मला “आमा, होमवर्क सकेर छिट्टै फर्किन्छु है।” निर्मलाले सानो प्लास्टिकमा आफ्ना साथीहरूका लागि केही अम्बा पोको पारिन्, पुरानो साइकल निकालिन् र मुस्कुराउँदै घरको आँगनबाट निस्किइन्। दिन ढल्यो। साँझ पर्यो। तर निर्मला फर्किनन्। बम दिदीबहिनीको घरबाट दिउँसो २ बजे नै निस्किसकेको भनिएकी निर्मला साँझ ८ बजेसम्म पनि घर पुगिनन्। आत्तिएका आमा–बुबा प्रहरी चौकी पुगे। त्यहीँ उनीहरूले राज्यबाट पहिलो धोका पाए। “पोइला गइहोली, केटासँग घुम्दै होली।” छोरी हराएको पीडामा छटपटाइरहेका आमाबुवामाथि बर्दीधारी रक्षकहरूको यो असंवेदनशील टिप्पणी थियो। यदि त्यो रात तत्काल खोजी अभियान सुरु भएको भए, सायद यो कथाको अन्त्य अर्कै हुन सक्थ्यो। भोलिपल्ट बिहान— साउन ११ गते। घरभन्दा केही परको उखुबारीमा निर्मलाको निर्जीव शरीर भेटियो। त्यो दृश्यले मान्छेको मात्र होइन, मानवताकै सातो उडायो। तर त्यो विभत्स घटनाभन्दा पनि डर लाग्दो दृश्य त त्यसपछि देखियो। अपराध अनुसन्धानमा घटनास्थललाई ‘मन्दिर’ मानिन्छ। तर यहाँ रक्षकहरू नै भक्षकको मतियार बने। एउटा अबोध बालिकाको शव नजिक भेटिएको सुरुवाल— जुन बलात्कारको सबैभन्दा महत्वपूर्ण प्रमाण हुन सक्थ्यो— प्रहरीकै हातले पानीमा चोबलेर पखालियो। के त्यो अज्ञानता मात्र थियो? कि कसैको पाप पखाल्ने नियोजित षड्यन्त्र? भीड जम्मा भयो। निर्मलाको साइकल, कापी–किताबहरू शवभन्दा केही पर असरल्ल थिए। तर संघर्षको कुनै चिन्ह थिएन। मानौँ, हत्या अन्तै कतै गरेर शव यहाँ सजाइएको थियो। तर प्रमाण नष्ट गर्ने हतारोमा फरेन्सिक टोली नपुग्दै शव उठाइयो। सत्य त्यही उखुबारीको माटोमुनि सधैँका लागि दबाइयो। जनआक्रोश बढ्दै गयो। राज्यले एउटा ‘पात्र’ खडा गर्‍यो— दिलिप सिंह विष्ट। ४१ वर्षीय मानसिक सन्तुलन गुमाएका व्यक्ति। प्रहरीले तयारी पटकथा सुनायो— “यसैले निर्मलालाई मारेको हो।” प्रमाणको नाममा च्यातिएको कमिज देखाइयो। पछि मात्र बन्द कोठाभित्रको सत्य बाहिर आयो। “यो अपराध स्वीकार गर, हामी तँलाई मासु र रक्सी दिन्छौं, नत्र मारिदिन्छौं।” एक मानसिक रोगीमाथि गरिएको यो यातना न्याय प्रणालीको अनुहारमा लागेको कालो धब्बा थियो। तर झूटको आयु छोटो हुन्छ। निर्मलाको शरीरबाट संकलित (जतिसुकै विवादित भए पनि) DNA र दिलिपको DNA मिलेन। विज्ञानले राज्यको झूट स्वीकार गरेन। एउटा निर्दोष बच्यो, तर असली अपराधी अझै पर्दा पछाडि मुस्कुराइरह्यो। निर्मलाको न्याय माग्दा सडक आगो बन्यो। सिङ्गो देश रोयो। कञ्चनपुरमा नारा लाग्यो— “सरकार, निर्मलालाई न्याय दे!” तर सरकारले न्यायको साटो गोली चलायो। भदौ ८ गते। १७ वर्षीय सन्नी— निर्मलाका लागि न्याय माग्दै सडकमा उत्रिएका एक किशोर— प्रहरीको गोली लागेर ढले। एउटा हत्याको छानबिन गर्नुपर्ने राज्यले अर्को हत्या गरेर जवाफ दियो। आज वर्षौं बितिसके। घटनास्थल नजिकको सेनाको ब्यारेक, बम दिदीबहिनीको घर, पटक–पटक फेरिएका बयानहरू, घटना लगत्तै रंगरोगन गरिएका कोठाहरू, सुरुवाल पखाल्ने प्रहरीहरू र शंकाको घेरामा रहेका ‘भीआईपी’ अनुहारहरू— सबै रहस्यकै गर्भमा छन्। निर्मलाका बुबा यज्ञराज पन्त— न्याय माग्दामाग्दै मानसिक रूपमा थाकिसके। आमा दुर्गा देवी— राज्यसँग लड्दालड्दै अन्ततः हार मान्न बाध्य भइन्। यो कथाको अन्त्य अझै लेखिएको छैन। निर्मलाको हत्यारा आज पनि स्वतन्त्र हिँडिरहेको छ। उनको नाममा कार्यक्रम चलाउनेहरू मन्त्री बने, प्रधानमन्त्री फेरिए, कानुनमन्त्री, आईजीपी, डीआईजी सबै बदलिए। तर नफेरिएको एउटा मात्रै सत्य छ— “निर्मलाको आत्माले अझै शान्ति पाएको छैन।” निर्मला पन्तप्रति हार्दिक श्रद्धाञ्जली।उखुबारीले देखेको सत्य “आमा, म छिट्टै फर्किन्छु” भन्दै निस्किएकी एउटी छोरी घर फर्किन पाइन। साँझ ढल्दै गयो, आकाश रातो भयो, आमाको मन रातभन्दा गहिरो अन्धकार बन्यो। चौकीको ढोकामा आँसु लिएर उभिँदा राज्यले भन्यो— “केटासँग होली।” त्यही रात न्याय निदायो, र अर्को बिहान उखुबारी रोयो। सानो साइकल, कापी–कलम, र च्यातिएको सपना माटोमा छरपस्ट। प्रमाण पखालियो पानीले, पाप पखालियो कि सत्य डुबाइयो? उखुबारी जान्दछ। एउटा निर्दोष बालिका, अर्को मानसिक रोगी, र बीचमा राज्यको झूट। विज्ञान चिच्यायो— “ऊ अपराधी होइन!” तर हत्यारा भीआईपी मुस्कानमा हरायो। न्याय माग्दा सडक आगो बन्यो, र न्यायकै नाममा गोली चल्यो। सन्नी ढल्यो, १७ वर्षको सपना रगतमा मिसियो, राज्य फेरि मौन भयो। बुबाको आवाज सडकमा गल्दै गयो, आमाको आँसु थाकेर रोकियो। मन्त्री फेरिए, कुर्सी सरे, तर एउटी छोरीको न्याय अड्कियो। आज पनि उखुबारी माटोमुनि सत्य बोकेर चुपचाप उभिएको छ। र देशले सुन्न नसकेको एउटा आवाज अझै गुञ्जिन्छ— “म निर्मला हुँ, मलाई न्याय चाहिन्छ।

Ashish jain

दिखावे की प्यास (आशीष की दृष्टि से) मूर्ख बहुत है दुनिया यहाँ, बस ज्ञान बाँटना पेशा है, स्वयं सीखने की बारी आए, तो लगता घोर अंदेशा है। झुककर ग्रहण करे जो विद्या, वह छोटा मान लिया जाता, आशीष, अहंकार की चोटी पर, बोध कहाँ टिक पाता है? थाली सजी-सजाई मिल जाए, सब उस पर टूट पड़ते हैं, मेहनत की आँच पर पकने से, अक्सर लोग मुकरते हैं। पका-पकाया सत्य चाहिए, खोज की राह से डरते हैं, बिना चले ही मंज़िल पाने की, झूठी कोशिश करते हैं। खोज रहे सब शांति यहाँ, पर शोर भीतर का भारी है, मौन को सुनने की हिम्मत, क्या हमने कभी विचारी है? शांति का मार्ग कठिन है, पर सब सुख की चाहत रखते हैं, अशांति के कड़वे घूँटों को, अमृत कहकर चखते हैं। मोक्ष-मोक्ष की रट लगी है, पर मोह का बंधन प्यारा है, निकलना कोई चाहता नहीं, जिसे जंजाल ने घेरा है। आशीष, मुक्त वही है जिसने खुद को, सत्य के साँचे में ढाला है, वरना इस दुनिया ने तो, बस भ्रम का जाल पाला है। ज्ञान वही जो आचरण में हो, बाकी सब वाचालता है, बिना साधना के सिद्ध हो जाना, बस एक कोरी कल्पना है। आशीष जैन (श्रीचंद) 7055301422

Jeetendra

पति: आज खाने में क्या है? पत्नी: जो कल था, वही गरम कर दिया है। पति: पर कल तो कुछ भी नहीं था? पत्नी: हाँ, तो आज भी वही है!😂😂😂

kattupaya s

Goodnight friends. have nice sleep and sweet dreams

Mariya

ভুতুড়ে ছলনাময়ী রাত নেমেছে, চুপচাপ ঘরে, ছায়া নাচে দেয়ালে, বুকে ঢেকে। দুরন্ত হেসে বলে, “আমি আছি এখানে”, কিন্তু দেখা নেই, শুধু বাতাসে খেলা। চিৎকার করো, আমি সাড়াবো, ছলনাময়ী ছায়া, খেলায় ডুবাবো। ফিরে দেখা, ঘরের কোণে হেসে, “ভয় পেও না, আমি বন্ধু, না কি শত্রু, মেসে?” হঠাৎ উড়ে গেল, লাফ দিয়ে পাশ, হাসতে হাসতে বলল, “আমি তো শুধু আশ!” রাত শেষে শুধু চুপচাপ বাতাস, ভূতুড়ে মজা, আর নেই কোনো ভয়-বাতাস।

kattupaya s

iam really upset with matrubharti in review system. the reviews are not getting updatedor not showing. anyone know the reason behind that? help me.

Jyoti Gupta

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kattupaya s

For whom iam writing? yesterday night suddenly I thought about this question. I don't know how many people enjoy the core of story. people lose interest in reading. but still I believe in story lovers. they may be small size group . they are the only reason that iam writing . seriously I didn't get right feedback from anyone. waiting for the good reviews. I requested tamil people many times to write a review. but they are busy. hope everything will be alright.

Shailesh Joshi

જેટલું પણ ખોટું થાય છે, એ, જાણી જોઈને વધારે ને અજાણતા ઓછું થાય છે, ને આ બંનેમાં પાછું સૌથી પહેલી જાણ તો ખોટું કરવાવાળાને જ થાય છે, ફર્ક માત્ર એટલો જ કે, ખોટું કરવામાં ખોટું કરતાં પહેલાં, ને અજાણતામાં ખોટું થઈ ગયા પછી જાણ થાય છે. - Shailesh Joshi

Prince Choudhary

‎मेरी जान, कच्ची उमर है, खुद को संभाला कर ‎गले में दुपट्टा डाल के बाहर आया कर ‎तुझे इश्क़ है हमसे, तो बताया कर ‎जैसे मैं समझाता हूँ तुझे, ‎तू भी कभी मुझे समझाया कर ‎मेरी जान, कच्ची उमर है, ‎खुद को दुनिया से बचाया कर ‎धूप भी मायूस लौट जाती है थक कर, ‎छत पर कपड़े सुखाने आया कर ✍️aprince

રોનક જોષી. રાહગીર

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archana

दुनिया को बताऊँ तो तमाशा बन जाएगा, अपनों को कहूँ तो घर उजड़ जाएगा… इसलिए दर्द को स्याही बना लिया मैंने, और काग़ज़ को अपना सबसे करीबी बना लिया। रो कर लिख देती हूँ अपने मन की हर बात, क्योंकि सुनने वाला कोई होता तो कलम चुप रहती… मन हल्का हो जाता है काग़ज़ से बात करके, इतनी-सी तसल्ली भी आजकल बहुत होती है जीने के लिए।

Zakhmi Dil AashiQ Sulagte Alfaz

🦋...𝕊𝕦ℕ𝕠 ┤_★__ मैं पागल हूँ, तो फिर ये कैसी शराफ़त                  पाल बैठा हूँ, कि ज़िल्लत सह रहा हूँ, और तुझको                  टाल बैठा हूँ, मेरा  दिल  साफ़ है, शायद  इसीलिए                कमज़ोर हूँ मैं, कि आस्तीन में अपनी, मैं अपना ही                 काल बैठा हूँ, मेरा बस चलता तो, अब  तक उसे           मिट्टी में मिला देता, मगर वो  शख्स अच्छा  है, ये  कैसे               ढाल बैठा हूँ.? हवस  होती  तो  शायद  कब  का          तुझको छीन लेता मैं, मगर  इस  पाकीज़ा  उल्फ़त  का          लेकर जाल बैठा हूँ, वो  मेरे  सामने  तेरा  हाथ  थामे              घूमता है अब, और मैं कम्बख़्त उसकी नेकी का             मलाल बैठा हूँ, बड़ी रुसवाई है इसमें बड़ी ज़िल्लत                की ये हद है, कि एक शरीफ़ की खातिर अपना        कफ़न डाल बैठा हूँ…🔥 ╭─❀💔༻  ╨──────────━❥ ♦❙❙➛ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी•❙❙♦ #LoVeAaShiQ_SinGh☜ ╨──────────━❥

jighnasa solanki

ठोकરો से गिरना आम बात है। किसी की नजरो से मत गिरना। उम्र निकल जाती है, खुद को सही साबित करने मे। 💔 💔 💔 💔 💔 💔 💔 💔 - jighnasa solank

kattupaya s

hopeless man gives you fake smiles. people still believe that smiles. be aware of fake smiles

kattupaya s

everyone is working hard. smart people utilize that.i mean it

kattupaya s

progress is invisible. but the result is the truth of your hardwork.live like a Jen monk

kattupaya s

people want to look down others. but I am not going to afford them to do it.

kattupaya s

it's hard to live with respect and dignity. but when you make it as a habit you are so happy with yourself.

Prithvi Nokwal

नाना-नानी का घर बहुत बड़ा नहीं था, पर उसमें दिल भर देने वाली जगह थी। कच्चा आँगन, मिट्टी की खुशबू और सुबह-सुबह चूल्हे का धुआँ। मामा-मामी का अपनापन, नानी की मीठी डाँट, नाना की शांत मुस्कान— सब कुछ सादा, पर सच्चा। वो गाँव, वो गलियाँ, जहाँ शोर नहीं, सुकून रहता था। आज भी यादों में वही छोटा सा घर सबसे बड़ा लगता है। - Prithvi Nokwal

Akanksha srivastava

दिखती है गिनती जब बहुमत खामोश है ------------------------------------------------ आखिर क्यों अच्छाई पर बुराई भारी दिखाई जाती है, आखिर क्यों इंसानियत पर गैरियत भारी दिखाई जाती है। आज भी दुनिया जज्बातों से भरी पड़ी है, फिर क्यों हर मोड़ पर बेमानी खड़ी है। आज भी कितने बच्चे चैन त्याग जाते है, पिता के सपनों को अपनी नींद बना जाते है। माँ की उम्मीदों से भरे आँचल को अपने सर का ताज बनाते है। खुद टूटकर भी घर का सपना साध जाते है, फिर क्यों उन तमाम होनहारों के ऊपर छा जाते है कुछ गिनती के कुपुत्। जहाँ आज भी सिरों पर, हज़ारों हाथों की छाया है, और उन हाथों ने अपनत्व भी तो पाया है। फिर क्यों प्रचारित होता है की वो महज एक लाचार छाया है। जहाँ आज भी कई घरों में बड़ों से पुछकर पकवान पकते है। फिर सिर्फ इसे क्यों प्रमुखता दी जाती की वे एक निवाले के लिए तरसते है। जहाँ बड़ों ने खींची है, मर्यादा की रेखा, जिसने पीढ़ियों को दिया ,सही राह को लेखा, फिर क्यों नजर आते है कुछ अमर्यादित आचरण, जो मिटा देते है संस्कारों का पावन आवरण, जहाँ आज भी बड़ों के हक का आदर होता है। संस्कारों से हर रिश्ता और गहरा होता है। फिर क्यों दिखाये जाते है, वो गिनती के बच्चे, जो अवहेलना कर बड़ों के मान को कुचलते। आखिर किसने हक दिया , हमारे अंकुरित होते बीज़ों के मानस पटल पर, ये गंदगी बिखरने की, नहीं इज़ाज़त होनी चाहिए, किसी को उस कच्चे मिट्टी के आकारों को बिगाड़ने की।

kattupaya s

Self respect quotes

Sonu Kumar

#10 राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड यह कानून शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी की तर्ज पर सनातनी हिन्दुओं के लिए एक धार्मिक ट्रस्ट का गठन करता है। इस ट्रस्ट का नाम राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड (RH.B.) होगा तथा इस ट्रस्ट का अध्यक्ष हिन्दू बोर्ड प्रधान कहलायेगा। राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड की मुख्य कार्यकारिणी में 1 प्रमुख एवं 4 न्यासियो सहित कुल 5 व्यक्ति होंगे। यह क़ानून सरकार द्वारा हथियावे जा चुके सभी देवालयों को भी सरकारी नियन्त्रण से मुक्त करता है। इस क़ानून को संसद से पास करने की जरूरत नही है। प्रधानमंत्री इसे सीधे गेजेट में छाप सकते है। इस क़ानून का पूरा ड्राफ्ट इस लिंक पर देखें- Tinyurl.com/HinduBoard प्रस्तावित राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड क़ानून के मुख्य बिंदु निचे दिए गए है 1. प्रधानमंत्री एक अधिसूचना जारी करके राम जन्म भूमि देवालय, अयोध्या का स्वामित्व हिन्दू बोर्ड को सौंपेंगे। इसके अलावा हिन्दू बोर्ड उन सभी देवालयों का भी प्रबंधन करेगा जिन्हें किसी मंदिर के मालिको ने इसे स्वेच्छा से सौंप दिया है। 2. बोर्ड उन देवालयों का अधिग्रहण / प्रबंधन नहीं करेगा जिनकी देख-रेख देवालय के मालिक RHB से नहीं कराना चाहते। हिन्दू बोर्ड प्रधान और न्यासी अपने नियंत्रण में मौजूद देवालयो को प्राप्त हुए दान को इस तरह खर्च करेंगे कि सनातन संस्कृति का सरंक्षण हो। 3. भारत में निवास करने वाला प्रत्येक हिन्दू इस बोर्ड का वोटिंग मेम्बर बन सकेगा। यहाँ हिन्दू से आशय है - उन सभी समुदायों, पन्थो, सम्प्रदायों के अनुयायी जो स्वयं को हिन्दू या सनातनी या सनातनी हिन्दू कहते है। 4. इस्लाम, ईसाई, पारसी, यहूदी एवं अन्य धर्म जो भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर उत्पन्न हुए है, के अनुयायी स्पष्ट रूप से इस क़ानून के दायरे से बाहर रहेंगे, एवं वे इस बोर्ड के वोटींग मेंबर नहीं बन सकेंगे। सभी प्रकार की मस्जिदे, चर्च, गुरूद्वारे, बौद्ध, जैन तीर्थ स्थल आदि हिन्दू बोर्ड के दायरे से बाहर रहेंगे। 5. यदि आप हिन्दू बोर्ड के सदस्य बनते है तो आपको एक बोट वापसी पासबुक मिलेगी ताकि आप हिन्दू बोर्ड प्रधान को बदलने के लिए स्वीकृति दे सके। 6. यदि हिन्दू बोर्ड प्रधान या उसके स्टाफ के खिलाफ कोई शिकायत आती है तो मामले को सुनने और दंड देने की शक्ति जजों के पास न होकर हिन्दू नागरिको की जूरी के पास रहेगी। प्रत्येक मामले के लिए अलग से जूरी होगी और फैसला देने के बाद जूरी भंग हो जाएगी। वर्तमान हिन्दू मंदिरों में धन के समाज में बांटने सम्बन्धी निर्णय मंदिर प्रमुख या संप्रदाय प्रमुख द्वारा लिए जाते है, तथा इनका ही मंदिरों की संपत्ति के उपयोग पर पूर्ण नियंत्रण होता है। ट्रस्टी का पद उत्तराधिकार तथा गुरु प्रथा द्वारा हस्तांतरित होता है। मतलब आज का गुरु ही अगला गुरु नियुक्त करता है। आजीवन कार्यकाल होने के कारण यहाँ संपत्ति इकठ्ठा करने की ओर झुकाव होता है, तथा इसका उपयोग तड़क-भड़क, दिखावे एवं ऐशो आराम में भी किया जाता है। सिक्खों में अकाल तख्त के ग्रंथी चुन कर आते है, और सीमित कार्यकाल (4 वर्ष) होने के कारण वे फिर से चुन कर आने के लिए गुरुद्वारो में आए दान को परोपकारी कार्यों में खर्च करने पर अधिक भार देते है। हिन्दू बोर्ड क़ानून के आने से हिन्दू मंदिरों में भी इसी तरह का अपेक्षित सुधार आएगा। राजवर्ग प्रजा के अधीन रहना चाहिए, वर्ना वो प्रजा को लूट लेगा और राज्य का विनाश होगा - अथर्ववेद पृष्ठ 6/2

Ved Vyas

Hello Dear Readers! I am back with a new, exciting sci-fi NOVEL only for you all. Into The Whispering Dark In a world driven by data, what happens when the math stops making sense? Set in 2098, Into The Whispering Dark follows Owen Anderson, an MIT prodigy who discovers a code that shouldn't exist. It’s a signal hidden beyond every digital system on Earth, leading him to the frozen silence of Antarctica. This isn't just a sci-fi mystery; it’s a story about: - The Human Spirit: Can imagination survive in an age of algorithms? - Forbidden Science: What lies beneath the ice that humanity isn't ready for? - The Cost of Truth: A journey of unfinished love and impossible choices. Start Reading Today If you enjoy hard science fiction, haunting mysteries, or stories that challenge our digital future, I’d love for you to check it out. The Chapters are rolling out soon... You can get the whole Novel on Amazon Kindle or Amazon Store. I hope my Novels give you a good Time and you all like it.

Ved Vyas

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smita

I don’t need perfect love or big promises ♥️🌼 I just want honesty, effort, and someone who chooses me even on the quiet days 💖🙂

kattupaya s

one side sleepless nights. other side cold wind in day time. it's hell or heaven?

kattupaya s

Good evening friends.. have a nice time

archana

कह दिया उसने – कब तक इलाज कराऊँगा, काश कोई पूछे… ये बीमारी क्या मैंने खुद लिखी है अपनी किस्मत में कहीं? इलाज मजबूरी है, कोई शौक नहीं मेरा, तानों में दबकर भी जीना पड़ता है हर रोज़ सवेरा। लाचार हूँ इसलिए हाथ फैलाना पड़ता है, वरना किसी को भीख बनकर जीना अच्छा नहीं लगता है।

Raju kumar Chaudhary

🎵 नया गीत: “संसार एक डेरा” 🎵 मुखड़ा (Chorus): संसार त एउटा डेरा हो, बस केही पलको बास, आज हाँसो, भोलि आँसु, यही जीवनको आस। खाली हात आए थियौँ, खाली हात नै जानु छ, दुःख–सुख सबै यहाँ, एकदिन छुट्नै जानु छ। अन्तरा 1: सुनौलो सपना बुन्छौँ, बालुवामा घरजस्तै, समयको एक झोक्का, सब बगाइ लैजस्तै। आज साथ छन् आफ्ना, भोलि याद मात्र बाँकी, जन्म र मृत्युबीचको, यो सानो कथा साँकी। मुखड़ा (Repeat): संसार त एउटा डेरा हो, बस केही पलको बास, आज हाँसो, भोलि आँसु, यही जीवनको आस। अन्तरा 2: धन, पद, अभिमान, सब यहीँ छुट्ने हो, साँचो कर्म र माया, मात्र साथ जाने हो। जो रोयो, जो हाँस्यो, सबै बराबर यहाँ, माटोले बोलाउँदा, चुपचाप जानु पर्छ जहाँ। ब्रिज: किन त घमण्ड गर्छौ, दुई दिनको जिन्दगी, माया बाँड, कर्म गर, यही हो साँचो बन्दगी। मुखड़ा (Final): संसार त एउटा डेरा हो, बस केही पलको बास, नाम होइन कर्म बाँचोस्, बाँकी सब विनास। अन्त (Outro): आज छ सास, आज छ मौका, राम्रै गरौं काम, भोलि के हुन्छ कसलाई थाहा, यही हो जीवनको नाम।https://youtube.com/@rajufilmyjunction?si=cCmXX87Yn7XPtluE

महेश रौतेला

जिन्दगी इतनी ही नहीं और अधिक थी, प्यास इतनी ही नहीं और अधिक थी। आसमान इतना ही नहीं और अधिक था, दुख इतना ही नहीं और बिखरा था, सुख इतना ही नहीं और जुड़ा था। ममता इतनी ही नहीं और फैली थी, प्यार इतना ही नहीं और बाकी था। धरती इतनी ही नहीं और जीवट थी, जीवन इतना ही नहीं और शेष था। **** *** महेश रौतेला

fiza saifi

कभी तो सुनो बिना कहे... कभी तो समझो... दिल की ज़ुबान... कभी तो आंखों के दर्द को पढ़ो... हर बात कहने की तो नहीं होती... हर बार चीजों को समझाने का समय तो नहीं होता... दिल का मौसम हमेशा अच्छा नहीं होता... कभी तो इस आंगन में गम भी उतरते हैं... कभी तो अंदर कहीं बारिश होती है... जो आंखों से चाहे बह न पाए... वो ज़ुबान पर कभी आ न पाए... वो जज़्बात, वो तकलीफ... वो अनकही, वादों के टूट जाने का दुख... वो अकेले रह जाने का डर... वो ज़िंदा होकर भी... ज़िंदगी के एहसास न होने का डर... क्या कभी महसूस कर सकते हो? जो था मेरे पास... वो भी खो दिया... वो नुकसान पूरा कर सकते हो?

અશ્વિન રાઠોડ - સ્વયમભુ

શીર્ષક: પડઘાનો ન્યાય જેવું વાવશો આ જગતમાં, તેવું જ પાછા લણશો, પ્રેમ આપશો તો પ્રેમ મળશે, ઘા કરશો તો હણાશો. અરીસામાં જેવું હસશો, તેવું સામે પામશો, આગ લગાડશો બીજાના ઘરે, તો તમારું ઘર બાળશો. માન દઈને બોલાવશો, તો માન મોટું પામશો, તુકારો દઈ તોછડાઈ કરશો, તો નફરત સામે હાથે પામશો. ખાડા ખોદશે જે કોઈ અન્ય કાજે, તે જ તેમાં પડશે, છળ-કપટના ખેલ રમનારા, છેલ્લે પોતે જ રડશે. કાંટા વાવીને રસ્તા પર, ફૂલની આશા ના રાખવી, કડવી વાણી બોલ્યા પછી, મીઠાશ ક્યાંથી ચાખવી? સીધો-સાદો હિસાબ છે, નથી કોઈ તેમાં ભેદ, ‘જેવા સાથે તેવા’ થાતાં, "સ્વયમ્'ભૂ" મટી જાય સૌ ખેદ. અશ્વિન રાઠોડ "સ્વયમ્'ભૂ"

kattupaya s

Aisi ulji nazar unse hatt-ti nahi Daant se reshmi dor katt-ti nahi Umra kab ki baras ke safeed ho gayi Kaari badari jawani ki chatt ti nahi Walla ye dhadkan bhadne lagi hai Chehre ki rangat udhne lagi hai Darr lagta hai tanha sone mein ji Dil to bachcha hai ji Dil to bachcha hai ji Thoda kaccha hai ji

Paagla

https://youtube.com/@paagla012?si=1oQpuitpJh_gMymS

Paagla

https://youtube.com/@paagla012?si=1oQpuitpJh_gMymS

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