Gujarati Whatsapp Status | Hindi Whatsapp Status
Saroj Prajapati

जीवन में रुपए पैसों के साथ थोड़ी दुआएं भी कमाएं सुना है! बुरे वक्त में जहां रुपया पैसा धरा रह जाता है वहां दुआ रूपी खजाना अपना असर जरूर दिखाता है। सरोज प्रजापति ✍️ - Saroj Prajapati

Sapna

Bhai sab bol rhe h ki LPG cylinders BLACK mein mil rhe h.. lekin mere ghar par toh RED mein h🤔🤭 Sochne wali baat toh hai yarr..😅

Raa

happy Sunday

Soni shakya

प्यार के असली मायने ये नहीं कि, कोई तुम्हें पाने के लिए बेताब हुआ जाता है..! बल्कि ये है कि , कोई तुम्हें खोने के ख्याल से ही डर जाता है..!! - Soni shakya

Avinash

The hardest part of one sided Lover's life - "We open up once and spend a lifetime regretting it"🙂

Anup Gajare

"दरिद्रता के स्वामी" ____________________________________________________ दरिद्रता हंसी से बहुत डरती है हंसी दब जाती है मूर्ख सत्ता के सामने। पुरानी प्रेमिकाओं के पास लौटना चाहता है कुछ बचा न हो तो खोए अतीत से प्रेम ही बुलाता हैं। डर संक्रामक है प्रेम नहीं अगर प्यार बांटने से बढ़ता तो कैस यू दरबदर न घूमता उसे पत्थरों से चन्नी न किया जाता। सत्ता हमेशा ही गरीबी रेखा से होते हुए अपना उपदेश पूरा करती हैं। और गरीबी क्या है बस सोच नहीं बल्कि उससे भी पुरातन विचार है। दो ही वर्ग प्यासे रहते हैं कॉमन आदमी का ग्लास हमेशा भूखा होता है आधा भरा हुआ। भिक्षा मांगता साधु ही इस देश का भविष्य है,था और रहेगा। आजादी किस क़ीमत पर मिली है या उसका भी कोई मूल्य होता है जिसे कभी ग़रीब इंसान खरीद नहीं पाता। मैं सार्वजनिक हु या मुझे सार्वजनिक ही होना चाहिये इसका फैसला कौन करता है? कौन मुकदमा लड़ता है इस कोर्ट में कई पीड़ाएं है जिन्होंने पवित्र ग्रंथो पर हाथ के तलवे रखते हुए उस अलाव से गर्मी प्राप्त की है गर्मी प्राप्त की है गर्मी के मौसम में। सर्द रेत पर तड़पती मछली समुद्र में डूबे दिन से पूछती है की इतनी मंहगाई क्यों? क्या होना ही बचा रहेगा अंतिम श्वास में बस कर्म ही जोता जाएगा या फल का भी सृजन हो सकता है। कितनी बरबादी दरिद्रता में फैली है इसका हिसाब इस देश की अर्थव्यवस्था अपने मार्च के बजट में जोड़ती क्यों नहीं। कुपोषित बच्चों के लिए ही मैं कविता के पौधें लगता हु उनको बारिश भी गिला नहीं करती। सड़न भरी दुर्गंधी में बोझ तले खामोश लकीरें खींचता रहा हु उनका कोई मतलब नहीं। तूम परेशान मत करना हलाहल काफी है नील कंठ अब और झेल नहीं सकता। शब्दों की थाली में रखे थे कुछ सत्य पर भूख इतनी थी कि झूठ ही पहले खा लिया गया। रात के अंधे कुएँ में झांकता रहा चाँद उसे भी डर था कि कहीं उसकी रोशनी कर्ज़ में न बदल दी जाए। किसी ने कहा— उम्मीद अभी जिंदा है मैंने देखा वो आईसीयू में पड़ी थी और ऑक्सीजन सिलेंडर नीलामी में बिक चुका था। सवालों की भीड़ में एक उत्तर नंगा खड़ा था उसने कपड़े नहीं पहने क्योंकि सच को ढकने के लिए अब कोई धर्म नहीं बचा था। भीख में मिली मुस्कान ज़्यादा ईमानदार थी उन हंसीयों से जो सत्ता के गलियारों में सैलरी पर रखी गई थीं। किताबों के पन्नों पर इतिहास चिल्लाता रहा पर वर्तमान ने अपने कानों में विकास का ईयरफोन लगा लिया। मिट्टी के घरों में अब भी सपने पकते हैं पर शहर की आग में उनकी खुशबू पहले ही जल जाती है। मैंने देखा— एक बच्चा भूखा था पर उसके आँसू सरकारी आँकड़ों में कभी शामिल नहीं हुए। वो जो आंकड़े बनाते हैं उन्हें भूख नहीं लगती शायद इसलिए उनकी भाषा में रोटी का कोई पर्याय नहीं होता। कौन तय करेगा कि दर्द कितना वैध है? क्या कोई मीटर है जिससे नापा जा सके गरीबी का तापमान? या फिर हर बार की तरह इसे भी एक योजना में बदल दिया जाएगा जिसका उद्घाटन किसी अमीर के हाथों होगा। मैंने अपने भीतर एक अदालत बनाई थी जहाँ न्यायाधीश भी मैं था और अपराधी भी पर सज़ा हमेशा गरीबी को ही मिली। वो जो नीलकंठ है— अब चुप नहीं है उसके गले में फंसा ज़हर धीरे-धीरे आवाज़ बन रहा है। और जब वो बोलेगा— तो शायद आकाश भी अपना रंग बदल लेगा। पर तब तक… दरिद्रता के स्वामी अपनी गद्दी पर बैठे रहेंगे और हम अपनी ही ज़िंदगी की याचिका लिखते रहेंगे। _____________________________________________

प्रमोद जगताप फलटणकर

गझल...

Narayan

प्रियतमा को देखकर नशा चढ़े तो कौन सा आश्चर्य, समंदर भी लड़खड़ा जाता है पूर्ण चंद्रमा को देखकर।

PRASANG

जिम्मेदार कौन है। थाली में नहीं रोटी, ये कैसा विकास है, सत्ता के हर चेहरे पर फरेब का लिबास है। सच बोलो तो लगते हो तुम गुनहगार यहाँ, धूर्तों के लिए हर तरफ़ खुल्ला निवास है। कानून भी बिकता है, कुर्सी भी नीलाम हुई, इंसाफ़ का इस दौर में बस नाम ही पास है। जो चुप है तमाशा देख, वो भी तो शरीक बना, मौन हर इक शख़्स ही चलती हुई लाश है। हक़ माँगते हो लेकिन फ़र्ज़ों से भागे फिरो, ये भीड़ नहीं जागी, सोया हुआ समाज है। अब आग बनो सीने में, डर भी जला दो सभी, ये वक्त नहीं सोच का, सीधा प्रहार है। “प्रसंग” अब उठ, सच को ज़ुबाँ से पुकार तू, मौन रहा तो तू खुद ही गुनहगार है। प्रसंग प्रणयराज रणवीर

Ghanshyam Patel

मां की आराधना तभी सार्थक है, जब............ कोई दुर्गा गर्भ में न मरे , कोई सीता अन्याय की सजा न भुगते , और कोई भी लक्ष्मी दहेज की बलि न चढ़े । 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

SAYRI K I N G

वो पहचान ही नहीं पाई उस दिल को जिसमें सिर्फ और सिर्फ वो बस्ती थी

PRASANG

खामोश भी गुनहगार है। थाली  में  नहीं   रोटी,  ये  कैसा  विकास  है, सत्ता के हर  चेहरे पर  फ़रेब का  लिबास है। सच  बोलो  तो  लगते  हो  तुम गुनहगार यहाँ, झूठों  के  लिए  हर तरफ़  खुल्ला निवास  है। कानून भी  बिकता है,  कुर्सी  भी  नीलाम हुई, इंसाफ़ का इस दौर में  बस  नाम ही  पास है। जो चुप है तमाशा देख, वो भी तो शरीक बना, खामोश हर इक शख़्स ही चलती हुई लाश है। हक़  माँगते  हो  लेकिन  फ़र्ज़ों से भागे फिरो, ये  भीड़  नहीं  जागी,  सोया  हुआ  समाज है। अब आग  बनो सीने में, डर भी जला दो सभी, ये   वक्त   नहीं   सोच  का,  सीधा  प्रहार  है। “प्रसंग” अब उठ, सच को  ज़ुबाँ से  पुकार तू, खामोश  रहा  तो  तू   खुद  ही  गुनहगार  है। -प्रसंग प्रणयराज रणवीर

Harshad Patel Pij

શુભ સવારનો સારો સંદેશ

Shailesh Joshi

હમણાં આપણને જ્યાં સુખ દેખાઈ રહ્યું છે, ત્યાં ખરેખર એ સુખ હોય પણ ખરું, છતાંય હમણાં આપણા માટે ખાલી એ સુખ એટલું મહત્વનું ન હોવું જોઈએ, પરંતુ આપણા માટે એ સમયે અતિ મહત્વનું એ જાણી લેવું હોવું જોઈએ કે, હમણા આપણને દેખાતા, કે મળતા એ સુખની "આવરદા" કેટલી છે ? - Shailesh Joshi

મનોજ નાવડીયા

દવા બની જા, સહારો બની જા, એકલો હોય જે, એનો સાથી બની જા, નિરાશા ઘેરાય જેને, એને આશા આપી જા, રડતું હોય જે મન, એને હસાવી તું જા, અંધકારમાં જે ખોવાયો, એને પ્રકાશ પાથરી જા, થાકયું છે જેનું જીવન, એનો આશરો બની જા. મનોજ નાવડીયા Happy poetry day.. #manojnavadiyapoetry #manojnavadiyabooks #manojnavadiya #kavita #goodthinking #poem #heetkari #vishvkhoj #vishvyatri #happypoetryday #poetrtday

Narendra Parmar

✔️💯

Narendra Parmar

कुछ लोग पागल होते हैं या फिर वो पागल होने की एक्टिंग करते हैं ! वो दूसरे लोगों को पागल करकें खुद अपनी लाइफ को एन्जॉय करते हैं और ख़ुश रहते हैं ।। नरेन्द्र परमार ✍️

Bhatt Bhavin

એક ગઝલ એમના માટે.....| ભટ્ટસાહેબ |

Neha kariyaal

एक बात तो अच्छे से समझ में आई... जो चीजें हमें hurt करती है, वहीं हमें attrect भी करती है।। और यही हमारे दुःख का कारण है।

Bhatt Bhavin

BhattSaheb

dhruti rajput

એની સાથે મારા પ્રેમ ની પરિભાષ કંઈક એવી છે કે હું સામે ઊભું ને એના હોઠ હંમેશા મારું માથું ચૂમે.. છે સવાલ હજારો આ મનમાં પણ જવાબ માત્ર એટલો છે કે એ ગળે લગાડે ને હું સવાલો ના ઘેરા માંથી મુક્ત થઈ જાવ ... કંઈક છે એવું જે મને હંમેશા તેના માં ઘોળ્યા કરે છે એક કુદરત નો અમૂલ્ય ટુકડો છે જે મને બહું પ્રેમ કરે છે.. રડું પણ ખરી ને પળમાં હસુ પણ ખરી પણ એક બંનેમાં છે એક મીણ ની માટી જે મને આનંદ ના ઉમળકા ભરી ભરી ને પ્રેમ કરે છે .....

Vartikareena

प्रेम शाश्वतं, मृत्यु शाश्वतः – एक झलक

Kavyasharma

तुम जिन्दगी की बात करते हों, हमने तो सांसों को तुम्हारे नाम किया है ।।

Vikrant Nalvekar

॥ मोरयाचा आधार ॥ विघ्नहर्त्या तुझ्या येण्याने, मिटले सर्व अंधार, तुझ्याच चरणी लाभला आम्हा, सुखाचा हा कौतुक-सोहळा अपार. भाळी लावूनी गंध शेंदरी, सजला हा दरबार, तुझ्या एका दर्शनाने, मिटतो आयुष्याचा थकवा आणि भार. मूर्ती तुझी साजिरी गोजिरी, डोळ्यांत भरते भक्ती, संकटाशी लढण्या देतोस, तूच आम्हाला शक्ती. तुझ्याच नामस्मरणात बाप्पा, मिळते मनाला शांती, अंधाऱ्या या जीवनात तूच, पसरवतोस तेजाची कांती. आशेचा तू दीप लावलास, काळजातल्या घरात, तुझाच वरदहस्त असावा, सदैव आमच्या शिरात. आशीर्वाद तुझा मिळता, दु:ख पळते थरांत, तुझ्याविना कुणीच नाही, या अथांग जगतात. चरणी तुझ्या लीन होऊनी, मागतो एकच दान, तुझ्या प्रेमाचा असाच राहो, आमच्यावर अभिमान. जय देव जय देव, तूच आमचा प्राण, भक्तांच्या या हाकेला, देई तू सदा प्रतिसाद अन् मान

Mara Bachaaaaa

अपनों के दायरे में सिमट रही उनकी जिंदगी खुश रहे वो दूर खड़े हम कर रहे बंदगी। - Mara Bachaaaaa

PRASANG

सवालों का मौसम जलते सच पर कड़ा पहरा लगा बैठा है, हर तरफ़ झूठ का चेहरा बना बैठा है। संसदों में अजब सन्नाटा पसरा देखो, सच कहे जो वही मुजरिम बना बैठा है। रोटियों के लिए लोग भटकते फिरते, कोई महलों में जश्न सजा बैठा है। आँख पर पट्टियाँ थीं तो शिकायत कम थी, अब तो इंसाफ़ भी खुद को बेचता बैठा है। मंदिरों में भी सियासत का ज़हर है, आदमी आदमी से फ़ासला बना बैठा है। कागज़ों पर तरक़्क़ी के नए रंग चढ़े, ख़्वाब हर एक ज़मीं पर मरा बैठा है। जो चला था सच की वो मशाल लेकर, डर के साए में चुपचाप छिपा बैठा है। कुर्सियों के लिए रोज़ उसूलों का सौदा, हर कोई अपना ईमान बेचता बैठा है। लफ़्ज़ में आग भर दे तू “प्रसंग” अब तो, वक़्त तुझसे भी कड़े सवालात लिए बैठा है। प्रसंग प्रणयराज रणवीर

Saliil Upadhyay

हेपी सन्डे 😀 डॉक्टर- मेरे पास आने से पहले आपने, किसी और डॉक्टर को दिखाया था क्या? मरीज- गली के नुक्कड़ पर जो छोटा सा दवाखाना है, वहां के डॉक्टर को दिखाया था। डॉक्टर- उस झोलाछाप ने जरुर कोई, बेवकूफी भरी सलाह दी होगी? मरीज - हां, उन्होंने कहा था कि, मैं जाकर आपको दिखाऊं.....! हंसते रहो और मस्त रहो 🤣

SAYRI K I N G

नवरात्रि के चलते मंदिर मे शादी की मन्नत मांगने गया था बाहर आया तो किसी ने जुता छुपाई की रस्म पूरी करदी..!

Dr Darshita Babubhai Shah

मैं और मेरे अह्सास भूमिजा भूमिजा ने राजा जनक का नाम रोशन किया l अच्छी बेटी, पत्नि और माँ का उदाहरण दिया ll रामजी के साथ चौदाह साल बनवास काटकर l सही माइने में सहधर्मिणी का फर्ज अदा किया ll एक बार भी नहीं पूछा क्यूँ सब छोड़ना होगा l उसने बिना वाद विवाद के आशीर्वाद लिया ll "सखी" डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

Narayan

एकटक निहारती वो आँखें, जैसे कोई सवाल पूछ रही हों, चेहरे की उस उदासी में, जैसे हज़ारों दर्द पल रहे हों। बिना कहे ही वो सब कुछ कह गई उस पल में, जैसे बिछड़ने का सारा मंज़र, उसकी खामोशी में ठहर गया हो।

PRASANG

મૌનના ઘાવ ભૂલભરી જિંદગીનું કર્જ હજુ બાકી રહી ગયા, સપના તૂટ્યા માર્ગ વચ્ચે, શ્વાસ અધૂરા રહી ગયા. શાંત નિશાની ક્ષણોમાં અંતર પીડા બોલતી, આંખભીના અશ્રુકણ હૈયામાં અટકાઈ રહી ગયા. સંગ મળેલા વચનો પવન સાથે ખોવાઈ ગયા, સ્મૃતિ દીવા પંથે પગચિહ્ન એકલા રહી ગયા. આશા લઈને ચાલતો સ્મિત ભરેલો માર્ગ પર, સમય પ્રહારે રંગીન સ્વપ્નો ફીકા રહી ગયા. જીવન અર્થ શોધતા અંતર થાકી ગયું ઘણું, હાસ્ય પડદા પાછળ આંસુ નિઃશબ્દ રહી ગયા. “પ્રસંગ” દિલની વાત સંપૂર્ણ લખાઈ શકી નહીં, કેટલાક ઘાવ મૌનમાં સદાય માટે રહી ગયા. - પ્રસંગ પ્રણયરાજ રણવીર

GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति-- (43) की व्याख्या "प्राता रत्नं प्रातरिश्वा दधाति" ऋगुवेद-- 1/125/1 भावार्थ--प्रात: जागने वाला ष्रातकाल ऐश्वर्य आपने जो मंत्र दिया है— “प्राता रत्नं प्रातरिश्वा दधाति” — यह ऋग्वेद (मण्डल 1, सूक्त 125, मंत्र 1) का अंश है। शाब्दिक अर्थ प्राता = प्रातःकाल (सुबह) रत्नम् = धन, ऐश्वर्य, श्रेष्ठ वस्तुएँ प्रातरिश्वा = प्रातःकाल में गति करने वाली शक्ति (वायु/प्राण/उषा का सूचक) दधाति = धारण करता है, प्रदान करता है अर्थ: प्रातःकाल में चलने वाली दिव्य शक्ति (वायु/प्राण) मनुष्य को रत्न (धन, ऐश्वर्य, शक्ति) प्रदान करती है। भावार्थ (गूढ़ अर्थ)-- जो व्यक्ति प्रातःकाल में जागता है, वह ऐश्वर्य, स्वास्थ्य और उन्नति प्राप्त करता है। इसका गहरा आध्यात्मिक संकेत है— प्रातःकाल (ब्राह्म मुहूर्त) में प्राणशक्ति सबसे शुद्ध और शक्तिशाली होती है। इस समय उठने वाला व्यक्ति— मानसिक स्पष्टता, आध्यात्मिक जागृति स्वास्थ्य और ऊर्जा तथा जीवन में सफलता (ऐश्वर्य) प्राप्त करता है। वेदों में प्रमाण-- 1( क) ऋग्वेद 5/75/5 (उषा सूक्त) “उषा उच्छन्ती भुवनानि विश्वा…” उषा (प्रभात) समस्त जगत को जागृत करती है और कर्म के लिए प्रेरित करती है। 1-ऋगुवेद- (ख) ऋग्वेद -7/77/2 “उषा देवी अमर्त्या व्युच्छति…” उषा (प्रातःकाल) अज्ञान को दूर कर प्रकाश (ज्ञान) देती है। 2.-यजुर्वेद (यजुर्वेद- 34/1) “उदु त्यं जातवेदसं…” उगता हुआ सूर्य (प्रातःकाल) अंधकार को हटाकर जीवन में ऊर्जा और चेतना लाता है। 3. अथर्ववेद (अथर्ववेद -19/47/1) “प्रातः प्रातः गृहपतिर्नो अग्निः…” प्रातःकाल में जागकर किया गया यज्ञ/कर्म जीवन को समृद्ध और सुरक्षित बनाता है। उषा (प्रभात) की महिमा — वेदों का समग्र संदेश वेदों में “उषा (सुबह) को देवी के रूप में वर्णित किया गया है, जो— जागृति देती है कर्म के लिए प्रेरित करती है धन, बल और आयु बढ़ाती है निष्कर्ष-- सभी वेदों का एक ही संदेश है— प्रातःकाल (ब्राह्म मुहूर्त) में जागना और कर्म करना ही ऐश्वर्य, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उन्नति का मूल कारण है। उपनिषदों में प्रमाण-- 1. कठोपनिषद् (1.3.14) “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।” अर्थ: उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञान को प्राप्त करो। संकेत: यहाँ “उत्तिष्ठत जाग्रत” स्पष्ट रूप से आलस्य त्यागकर जागरण (विशेषतः प्रातःकालीन जागृति) की प्रेरणा देता है, जिससे ज्ञान और सफलता मिलती है। 2. बृहदारण्यक उपनिषद् (1.3.28) “असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय॥” अर्थ: अज्ञान (अंधकार) से ज्ञान (प्रकाश) की ओर ले चल। संकेत: यह “अंधकार से प्रकाश” जाने का भाव प्रभात (उषा) और जागरण का प्रतीक है—जो प्रातःकाल में साधना से संभव है। 3. छांदोग्य उपनिषद्- (7.6.1) “य एषोऽन्तरहृदय आकाशः…” भावार्थ: हृदय में स्थित आत्मा का ज्ञान ही सर्वोच्च संपत्ति (रत्न) है। संकेत: प्रातःकाल की साधना (ध्यान) से यह आंतरिक ‘रत्न’ (ज्ञान/आनंद) प्राप्त होता है। 4. तैत्तिरीयोपनिषद् (शिक्षावल्ली 1.11) “स्वाध्यायान्मा प्रमदः।” अर्थ: स्वाध्याय (अध्ययन/साधना) में प्रमाद (आलस्य) न करो। संकेत: यह निर्देश देता है कि नियमित साधना (जो प्रातःकाल सर्वोत्तम है) से ही उन्नति और ऐश्वर्य मिलता है। 5. माण्डूक्य उपनिषद् (मन्त्र- 2) “अयं आत्मा ब्रह्म।” भावार्थ: आत्मा ही ब्रह्म है—यह ज्ञान ही सर्वोच्च ‘रत्न’ है। 6- अमृतबिन्दु उपनिषद् --2 “मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।” अर्थ: मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण मन ही है। संकेत: प्रातःकाल में मन सबसे शांत और शुद्ध होता है, इसलिए उस समय साधना करने से मोक्षरूप ऐश्वर्य (आंतरिक रत्न) प्राप्त होता है। 7. कैवल्य उपनिषद् (मन्त्र- 2) “श्रद्धाभक्तिध्यानयोगादवेहि।” अर्थ: श्रद्धा, भक्ति और ध्यानयोग से (ब्रह्म को) जानो। संकेत: ध्यान का श्रेष्ठ समय प्रातःकाल माना गया है, जिससे परम ज्ञान (सबसे बड़ा रत्न) मिलता है। 8. नारायण उपनिषद् -- 1 “नारायणः परो ज्योतिरात्मा नारायणः परः।” अर्थ: नारायण ही परम ज्योति (प्रकाश) हैं। संकेत: “ज्योति” (प्रकाश) का संबंध प्रभात/उषा से है—अर्थात् प्रातःकालीन साधना से परम प्रकाश (ज्ञान) प्राप्त होता है। 9- मुण्डकोपनिषद् (1.2.12) “तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्…” अर्थ: उस परम ज्ञान को पाने के लिए गुरु के पास जाओ। संकेत: गुरु-उपासना, स्वाध्याय और साधना का श्रेष्ठ समय प्रातःकाल है, जिससे ज्ञानरूप “रत्न” मिलता है। 10- प्रश्नोपनिषद् (1.1) “तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया…” अर्थ: तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा से ही ज्ञान प्राप्त होता है। संकेत: तप (अनुशासन) में प्रातःकालीन जागरण और साधना मुख्य है, जिससे जीवन में उन्नति होती है। 11. श्वेताश्वतर उपनिषद् (2.15) “युञ्जानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय…” भावार्थ: मन को एकाग्र कर ध्यान करने से परम सत्य की प्राप्ति होती है। संकेत: ध्यान के लिए प्रातःकाल (शांत समय) सर्वोत्तम है, जहाँ मन शीघ्र एकाग्र होता है। निष्कर्ष-- इन सभी उपनिषदों का एक ही संदेश है— मन की शुद्धि, ध्यान, स्वाध्याय और जागरण—ये ही जीवन के “रत्न” (ज्ञान, शांति, मोक्ष, ऐश्वर्य) देने वाले हैं। और इन सबका श्रेष्ठ समय है— प्रातःकाल (ब्राह्म मुहूर्त)। पुराणों में प्रमाण-- 1. पद्म पुराण (उत्तरखण्ड 72/2) “ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थमायुषः।” अर्थ: मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए, इससे आयु, स्वास्थ्य और कल्याण की रक्षा होती है। 2. अग्नि पुराण (अध्याय 167/2) “ब्राह्मे मुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी।” अर्थ: ब्रह्ममुहूर्त में सोते रहना पुण्य का नाश करने वाला है। 3. स्कन्द पुराण (वैष्णवखण्ड 4/2/12) “सूर्योदयात् पूर्वमेव स्नानं दानं जपं तथा। कुर्वन् मनुष्यः लभते सर्वकामफलप्रदम्॥” अर्थ: जो व्यक्ति सूर्योदय से पूर्व स्नान, दान और जप करता है, वह सभी इच्छित फलों को प्राप्त करता है। 4. गरुड़ पुराण (पूर्वखण्ड 1/109/14) “ब्राह्मे मुहूर्ते उत्थाय चिन्तयेदात्मनो हितम्।” अर्थ: ब्रह्ममुहूर्त में उठकर मनुष्य को अपने आत्मिक कल्याण का चिंतन करना चाहिए। 5. ब्रह्मवैवर्त पुराण (कृष्णजन्मखण्ड 27/14) “प्रातःकाले हि कृतं कर्म सर्वपापैः प्रमुच्यते।” अर्थ: प्रातःकाल में किया गया कर्म मनुष्य को पापों से मुक्त करता है। 6. विष्णु पुराण (अंश 3, अध्याय 11श्लोक 1) “उत्तिष्ठेत् ब्राह्मे मुहूर्ते धर्मार्थौ चिन्तयेत् बुधः।” अर्थ: बुद्धिमान व्यक्ति ब्रह्ममुहूर्त में उठकर धर्म और अर्थ (जीवन के कर्तव्य और उन्नति) का चिंतन करे। 7-. नारद पुराण (पूर्वभाग 7/3) “ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठन् धर्मार्थौ चिन्तयेद् बुधः।” अर्थ: बुद्धिमान व्यक्ति ब्रह्ममुहूर्त में उठकर धर्म और अर्थ का चिंतन करे। 8-- मार्कण्डेय पुराण (अध्याय 34/5) “प्रातःकाले तु कर्तव्यं स्नानं जप्यं विशेषतः।” अर्थ: प्रातःकाल में स्नान और जप विशेष रूप से करना चाहिए। 9-- लिंग पुराण (पूर्वभाग 1/8/9) “ब्राह्मे मुहूर्ते जाग्रत् स्यात् स्मरेन्नारायणं हरिम्।” अर्थ: ब्रह्ममुहूर्त में जागकर भगवान का स्मरण करना चाहिए। 10-- वामन पुराण (अध्याय 14/22) “सूर्योदयात् पूर्वमेव कर्तव्यं धर्मसाधनम्।” अर्थ: सूर्योदय से पहले धर्म-साधना करनी चाहिए। 11--कूर्म पुराण (पूर्वभाग 2/16/4) “प्रातःकाले समुत्थाय कुर्याद् धर्ममनुत्तमम्।” अर्थ: प्रातःकाल उठकर उत्तम धर्म का आचरण करना चाहिए। 12-- ब्रह्म पुराण (अध्याय 23/18) “ब्राह्मे मुहूर्ते उत्थाय ध्यानं कुर्यात् समाहितः।” अर्थ: ब्रह्ममुहूर्त में उठकर एकाग्रचित्त होकर ध्यान करना चाहिए। निष्कर्ष इन सभी पुराण प्रमाणों से यह सिद्ध होता है— प्रातःकाल (ब्रह्ममुहूर्त) में जागरण और साधना ही—धर्म (सदाचार) अर्थ (उन्नति/ऐश्वर्य) काम (संतुलित इच्छाएँ) मोक्ष (आत्मिक मुक्ति) प्राप्त करने का मुख्य साधन है। निष्कर्ष: जो व्यक्ति प्रातःकाल में जागकर साधना करता है, वही जीवन के समस्त “रत्न” (भौतिक + आध्यात्मिक ऐश्वर्य) प्राप्त करता है। भगवद्गीता में प्रमाण-- 1- (अध्याय 6, श्लोक 10) “योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।” अर्थ: योगी को एकांत में निरंतर अपने मन को योग में लगाना चाहिए। संकेत: ध्यान का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल (शांत वातावरण) होता है, जिससे मन एकाग्र होकर उन्नति करता है। 2. (अध्याय 6, श्लोक 16-17) “नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः… युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु…” अर्थ: न तो अधिक खाने वाले का, न बिल्कुल न खाने वाले का—योग सिद्ध होता है; जो आहार-विहार और कर्म में संयम रखता है, वही सफल होता है। संकेत: प्रातःकाल में नियमित दिनचर्या (जागरण, साधना) संतुलित जीवन का भाग है, जिससे सफलता मिलती है। 3. (अध्याय 2, श्लोक 69) “या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।” अर्थ: जो समय सबके लिए रात्रि (अज्ञान/निद्रा) है, उस समय संयमी पुरुष जागता है। संकेत: यह स्पष्ट रूप से बताता है कि संयमी व्यक्ति (योगी) प्रातःकाल में जाग्रत रहता है, और वही ज्ञान व उन्नति प्राप्त करता है। 4. (अध्याय 14, श्लोक 6) “तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकम्…” अर्थ: सत्त्वगुण निर्मल है और प्रकाश (ज्ञान) देने वाला है। संकेत: प्रातःकाल सत्त्वगुण का समय है, इसलिए उस समय किया गया कार्य ज्ञान और शांति (आंतरिक ऐश्वर्य) देता है। 5. (अध्याय 8, श्लोक 7) “तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।” अर्थ: हर समय मेरा स्मरण करते हुए अपना कर्तव्य करो। संकेत: दिन की शुरुआत (प्रातःकाल) में स्मरण और साधना करने से पूरा जीवन सफल होता है। निष्कर्ष-- श्रीमद्भगवद्गीता का स्पष्ट संदेश— संयम, जागरण, ध्यान और सात्त्विक जीवन—ये ही वास्तविक “रत्न” (ज्ञान, शांति, सफलता) देने वाले हैं। और इनका सर्वोत्तम प्रारंभ होता है— प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में जागरण से। महाभारत में प्रमाण-- 1. (शान्ति पर्व 163/3) “ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत् धर्मार्थौ चिन्तयेद् बुधः।” अर्थ: बुद्धिमान व्यक्ति ब्रह्ममुहूर्त में उठकर धर्म और अर्थ का चिंतन करे। 2. (अनुशासन पर्व 104/64) “उत्तिष्ठेत् ब्राह्मे मुहूर्ते स्मरेद् धर्ममनुत्तमम्।” अर्थ: ब्रह्ममुहूर्त में उठकर श्रेष्ठ धर्म का स्मरण करना चाहिए। 3. (शान्ति पर्व 232/12) “प्रातःकाले समुत्थाय कर्तव्यं धर्मचिन्तनम्।” अर्थ: प्रातःकाल उठकर धर्म का चिंतन करना चाहिए। 4. (वन पर्व 313/117) “सूर्योदयात् पूर्वमेव कर्तव्यं पुण्यकर्म च।” अर्थ: सूर्योदय से पहले ही पुण्य कर्म करना चाहिए। 5. (शान्ति पर्व 167/9) “प्रातःकाले हि कृतं कर्म सर्वपापैः प्रमुच्यते।” अर्थ: प्रातःकाल में किया गया कर्म मनुष्य को पापों से मुक्त करता है। निष्कर्ष-- इन सभी महाभारत के प्रमाणों से स्पष्ट होता है— ब्रह्ममुहूर्त में जागना और प्रातःकाल में धर्म, जप, ध्यान, सत्कर्म करना—धर्म (सदाचार) अर्थ (ऐश्वर्य/उन्नति), यश (प्रतिष्ठा) और मोक्ष (आध्यात्मिक उन्नति) प्राप्त करने का मुख्य साधन है। स्मृतियों में प्रमाण-- 1. मनुस्मृति (अध्याय 4, श्लोक 92) “ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थमायुषः।” अर्थ: मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए, इससे आयु और स्वास्थ्य की रक्षा होती है। 2. याज्ञवल्क्य स्मृति (अध्याय 1, श्लोक 145) “ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत् धर्मार्थौ चिन्तयेद् बुधः।” अर्थ: बुद्धिमान व्यक्ति ब्रह्ममुहूर्त में उठकर धर्म और अर्थ का चिंतन करे। 3. अत्रि स्मृति (अध्याय 1, श्लोक 64) “प्रातःकाले तु कर्तव्यं स्नानं जप्यं विशेषतः।” अर्थ: प्रातःकाल में स्नान और जप विशेष रूप से करना चाहिए। 4. पराशर स्मृति (अध्याय 1, श्लोक 60) “ब्राह्मे मुहूर्ते उत्थाय स्मरेन्नारायणं हरिम्।” अर्थ: ब्रह्ममुहूर्त में उठकर भगवान का स्मरण करना चाहिए। 5. हरित स्मृति (अध्याय 3, श्लोक 20) “सूर्योदयात् पूर्वमेव कर्तव्यं धर्मसाधनम्।” अर्थ: सूर्योदय से पहले धर्म-साधना करनी चाहिए। 6. गौतम धर्मसूत्र (अध्याय 2, श्लोक 1) “उत्तिष्ठेत् ब्राह्मे मुहूर्ते स्वाध्यायं समाचरेत्।” अर्थ: ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्वाध्याय करना चाहिए। निष्कर्ष-- इन सभी स्मृति प्रमाणों से स्पष्ट सिद्ध होता है— प्रातःकाल (ब्रह्ममुहूर्त) में जागना और,स्वाध्याय (अध्ययन),जप (स्मरण),ध्यान (एकाग्रता) धर्माचरण करना ही आयु, स्वास्थ्य, यश,ऐश्वर्य और मोक्ष प्राप्त करने का मुख्य साधन है। प्रमुख नीति ग्रन्थों से प्रमाण-- (श्लोक/सूक्ति सहित) प्रस्तुत हैं— 1. चाणक्य नीति (अध्याय 15, श्लोक 1) “ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थमायुषः।” अर्थ: मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए, इससे आयु और स्वास्थ्य की रक्षा होती है। 2. हितोपदेश “उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।” अर्थ: कार्य परिश्रम (उद्यम) से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा से नहीं। संकेत: प्रातःकाल में जागकर कर्म करने वाला ही सफल होता है। 3. पंचतंत्र “निद्रालस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।” अर्थ: निद्रा और आलस्य मनुष्य के शरीर में रहने वाले बड़े शत्रु हैं। संकेत: जो प्रातःकाल में आलस्य छोड़ता है, वही उन्नति करता है। 4. विदुर नीति (महाभारत, उद्योगपर्व 33/67) “उत्तिष्ठेत् ब्राह्मे मुहूर्ते हितं चिन्तयेदात्मनः।” अर्थ: ब्रह्ममुहूर्त में उठकर मनुष्य को अपने हित का चिंतन करना चाहिए। 1. रामायण (बालकाण्ड 23/2) “कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वा सन्ध्या प्रवर्तते। उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्तव्यं दैवमाह्निकम्॥” अर्थ: हे राम! प्रातःकाल (पूर्व संध्या) हो गई है, उठो और अपने नित्य कर्म (साधना) करो। प्रातःकाल (ब्रह्ममुहूर्त) में जागरण और साधना के विषय में योगवशिष्ठ तथा गर्ग संहिता से संक्षेप में प्रमाण इस प्रकार हैं— योगवशिष्ठ-- “प्रातःकाले समुत्थाय चिन्तयेदात्मनो हितम्।” अर्थ: प्रातःकाल उठकर मनुष्य को अपने आत्मिक कल्याण का चिंतन करना चाहिए। निष्कर्ष: प्रातःकाल आत्मचिन्तन, ज्ञान और उन्नति का सर्वोत्तम समय है। गर्ग संहिता “ब्राह्मे मुहूर्ते उत्थाय कृष्णं ध्यायेत् समाहितः।” अर्थ: ब्रह्ममुहूर्त में उठकर एकाग्रचित्त होकर भगवान का ध्यान करना चाहिए। “प्रातःकाले हरिनाम स्मरणं सर्वसिद्धिदम्।” अर्थ: प्रातःकाल में भगवान का नाम स्मरण करना सभी सिद्धियाँ देने वाला है। -------+--------+---------+---------+-

aakanksha

गंगा की हवा, वो गलियाँ काशी की, यादों में अब भी महकती रहेंगी। छोड़ तो रहा हूँ आज तेरी चौखट, पर मेरी पहचान यहीं से रहेगी। मेरे हर ख़्वाब में एक नाम रहेगा— Banaras Hindu University, तू सिर्फ़ विश्वविद्यालय नहीं, मेरी ज़िंदगी का एक ख़ूबसूरत मुकाम रहेगा।

Anjali Singh

चेहरे पर मुस्कान, दिल में हिसाब रखते हैं, आजकल अपने भी दूरी का नकाब रखते हैं।

Narayan

एकटक निहारती वो आँखें, जैसे कोई सवाल पूछ रही हों, चेहरे की उस उदासी में, जैसे हज़ारों दर्द पल रहे हों। बिना कहे ही वो सब कुछ कह गई उस पल में, जैसे बिछड़ने का सारा मंज़र, उसकी खामोशी में ठहर गया हो।

ziya

मौत से भी बढकर होता है तन्हा बैठ कर बीते हुए पलो को याद करना

Raa

kon kon padai kar rahahe aabhi

Thakor Pushpaben Sorabji

રાત્રીએ અંધકાર ઘેરાઈ જાય છે ઉદાસી એ મન ભરાઈ જાય છે જય શ્રી કૃષ્ણ "પુષ્પ" - Thakor Pushpaben Sorabji

SAYRI K I N G

हाथों ने पैरो से पूछा.... सब तुम्हे हीं प्रणाम करते हैं, मुझे क्यों नही..? पैरो ने बोला, उसके लिए जमीन पर रहना पड़ता हैं, हवा मे नही..!!

Durgeshwari Sharma

Beautiful Roses...

उषा जरवाल

एक घर के आँगन में बहुत सारे पौधे लगे हुए थे जिन्हें इनके माली ने मेहनत, लगन और स्नेहमयी स्पर्श देकर सींचा था । समय के साथ उन पौधों के आँगन अलग हो गए और वे नई मिट्टी में जाकर अपनी - अपनी दुनिया में ख़ुशी से रहने लगे । सब एक - दूसरे से दूर थे लेकिन जब तक माली था तब तक अपनेपन की बयार ने उन्हें एक - दूसरे से जोड़कर रखा था । एक दिन माली चला गया और धीरे - धीरे उनके बीच जो अपनेपन की डोर थी वो खिंचती चली गई । डोर इतनी दूर तक खिंच चुकी थी कि अब हवा ने भी उनके बीच आना बंद कर दिया था लेकिन पता नहीं क्यों एक पौधे को विश्वास था कि चाहे जो भी हो जाए लेकिन एक शीतल बयार है जो उसके मुरझाते हुए शरीर में नई चेतना का संचार करती रहेगी । भले ही वह शीतल बयार अपनी राह बदल चुकी है लेकिन उस पौधे की आस अभी भी बनी हुई है ।

Chinmayee

सोचती हूं अपने इन अश्कों से अपनी प्यास बुझा लूं आपकी इस तस्वीर को निहारते निहारते अपनी आस भुला लूं पर यह कमबख्त आंखें बेवफा है आपकी हर एक बात पर अपने अंदर सैलाब लिए फिरता है नज़रे चुरा के नज़रे छुपा के चलता है । मासूम से दिल पर आपका यह सितम कैसा पूर्णिमा के रात को समंदर की वो उमड़ती तरंग जैसा बौने का चांद की चाहत जैसा। दिल पेस किया था कोई खिलौना नही फूल जैसा दिल था मेरा आपको हमने दिल में समाया और हमारा हश्र क्या ही बताएं अपने हमें पैरों तले दफ़न कर दिया।

Mr.Sanket Gohil

પાંપણોને સપનાનો ભાર ના હોય... ને પ્રેમમાં કોઈ ચોક્કસ વ્યવહાર ના હોય... મળે ત્યારે મૌસમ વંસંત જ હોય... ના મળે તો પાનખરની વાટ ના હોય ... આનંદ દરેક ક્ષણનો શણગાર હોય... ને વિરહમાં પણ મીઠાસનો અભાવ ના હોય... જગત ભૂલવાની મજા પ્રેમમાં હોય... ને પ્રેમમાં ત્યાગ નો ઇનકાર ના હોય...🖋

Beyondwords

​भावनाओं का एक मेघ था मैं….... "कभी-कभी प्रेम केवल समर्पण नहीं, एक गहरा विसर्जन होता है। जहाँ एक मेघ अपना समूचा आकाश छोड़कर सिर्फ इसलिए बरसता है कि कोई प्यासी कली खिल उठे। पर क्या होता है तब, जब बरसने वाले की पवित्रता, सामने वाले के लिए केवल एक 'बेचैनी' बन जाए? यह कविता उसी अनसुनी बारिश की कहानी है..." भावनाओं का एक मेघ था मैं… तेरी सादगी और तेरी ख़ुशबू में इतना खो गया कि अपना आकाश, अपना अस्तित्व… सब भूल बैठा। अपने हर धड़कन, हर दर्द, हर खुशी को नाज़ुक शब्दों की बूँदें बनाकर बस तेरे ऊपर ही बरसाता रहा— इस यक़ीन के साथ कि मेरे प्रेम की बारिश से तू और खिलेगी, और मेरी बूँदों में अपना प्रतिबिंब ढूँढेगी। पर क़िस्मत को कब वसंत महसूस हुआ है… बरसने की चाह तो हर किसी में होती है, पर भीगने की हिम्मत हर दिल में नहीं। जब मेने देखा, तो तू छाते की नीचे छिपी हुई थी— जैसे बारिश तेरी पीड़ा हो, और मेरा प्रेम कोई आशीर्वाद नहीं, एक अनजानी, अनचाही बेचैनी हो। तभी समझ आया— भावनाएँ कितनी भी पवित्र हों, अगर सामने वाला दिल स्वीकार की एक धड़कन भी ना दे, तो बूँदें छूती नहीं— बस फिसलकर बह जाती हैं। पानी जैसा शुद्ध प्रेम भी अगर कोई उसे प्यास से न अपनाए, तो वह जीवन नहीं देता… सिर्फ़ एक बहाव बनकर रह जाता है। मैं तो आज भी अपना आकाश छोड़कर तेरे लिए बरसने को तैयार हूँ… पर तू— तूने अपने ऊपर भीगने का अधिकार तक आने नहीं दिया। "अंततः, प्रेम का होना ही पर्याप्त नहीं होता, उसे समेटने की पात्रता भी चाहिए। बूँदें तो गिरती रहेंगी, पर जो भीगने का 'अधिकार' ही न दे, उसके लिए समंदर भी बस एक व्यर्थ बहाव है। मेघ आज भी खड़ा है, अपने खालीपन और भरे हुए मन के साथ—सिर्फ एक स्वीकार की धड़कन के इंतज़ार में।" @beyond_word✍️

SAYRI K I N G

अरब खरब धन जोड़िए, करिए लाख फरेब। धरा यहीं रह जाएगा, नहीं कफन में जेब।

Avinash

❤️😇✅

kattupaya s

Goodnight friends.. sleep well

kattupaya s

one of my Tamil short story "madumitha velaiku pogiral" will going to be published on matrubharti at 2.15pm on 22/3/2026.please read and expecting all your support

kattupaya s

என்னுடைய சிறுகதையான மதுமிதா வேலைக்கு போகிறாள் நாளை 22/3/26 matrubhatri யில் 2 15 pm வெளியாக உள்ளது. தவறாமல் வாசிக்கவும்.

Anjana Vyas

*मेरे पुरखो की सैकड़ों साल पहले की गई भविष्यवाणी -जब आएगा बीसा मोहम्मद रहेगा, ना ईसा। संक्षेप में --युधिष्ठिर संवत् 5164 !! विक्रमसंवत 2077 - 57= 2020 ईस्वी सन् कोरोना और विक्रम संवत 2083- 57= 2026 ईस्वी स्थितियाँ !! आगे-आगे देखिये होता है क्या? **अनंत कुमार व्यास मारवाड़ी ** - Anjana Vyas

mohansharma

वो अपने में खूब राज छुपाए बैठा था मोहन.. जो अपने आप को खुली किताब कहता था.

Chaitanya Joshi

ક્યારેક કવિના હૃદયને મળી જુઓ. ને ધબકારા એના સાંભળી જુઓ. ગાતું હૃદય ધરાવે છે કવિ મહાશય, ક્યારેક લાગણીને સમજી જુઓ. વહેતી ગંગા સમું ઉર છે એનું સદા, ક્યારેક શબ્દો દ્વારા માણી જુઓ. તમને ભોળું બાળક યાદ આવશેને, એના દૈવતને કદી પીછાણી જુઓ. શારદા વસી હશે એના શબ્દોમાં, આવા કવિત્વને બિરદાવી જુઓ. -ચૈતન્ય જોષી 'દિપક' પોરબંદર.

Ajit

કવિતા દિવસની ખુબ ખુબ શુભેચ્છાઓ......😭🙏🙏🙏💐💐💐

Mukteshwar Prasad Singh

हर सांस में खुश्बू हर आती जाती सांसों में, तेरी खुश्बू ही आती है। वो बार बार तड़पाती है यादों की धूंध मिटाती है। अनगिन कांटे हैं चुभी हुईं, अनगिन घावें हैं हरी अभी। फिर भी तेरे स्पर्शों से, हर दर्द खुशी बन जाती है। जिस रस्ते पर हैं चले साथ,जिन वादों की कस्में लिये हाथ। बिखरे टूटे उन कस्मों से,तेरे आने की आहट आती है। सूखी सूखी तेरे ओठों पे,कब खुशी की लाली आएगी। कब दौड़ कर तू आ जाएगी,हर क्षण आभास कराती है। *मुक्तेश्वर मुकेश कविता दिवस,21 मार्च 2026 - Mukteshwar Prasad Singh

Rahul Raaj

मुझे तुमसे गले मिलना है और बहुत देर तक मिलना है, जहाँ साँसें एक-दूसरे में खो जाएँ जहाँ शब्द अपनी जरूरत खो दें जहाँ सिर्फ धड़कनों की आवाज बचे और वक़्त भी थम कर बस देखे कि दो लोग कैसे एक दूसरे में घर पा लेते है। मुझे तुमसे ऐसे मिलना है जैसे कोई थका हुआ परिंदा आखिरकार अपनी शाख ढूंढ ले और फिर उसे उड़ जाने की कोई जल्दी न है

Beyondwords

કોઈને પ્રેમ કરવું, મંદિરના પગથિયાં ચઢવા જેવું— દરેક પગથિયે છે આશા, અનિશ્ચિતતા, અને હૃદયની નાની નાની ઝંખના. ખબર તો ક્યાં પડે, કે અંતે ભગવાન મળશે કે નહીં? તે જ રીતે, દિલનો દીવો, જેનાં માટે પ્રગટાવ્યો છે, તેના સુધી પ્રકાશ પહોંચશે કે નહીં. તોય છતાં, હૃદયની અંદર એક અજ્ઞાત શક્તિ, આગળ ધપાવતી રહે છે— પૂરી શ્રદ્ધા, પૂરા વિશ્વાસ સાથે, પ્રેમની નમ્ર યાત્રા આગળ વધતી રહે છે. પ્રેમ એ ખાતરીનો માર્ગ નથી, એ તો આસ્થા અને લાગણીઓની મુસાફરી છે જ્યાં ચમત્કારો પગલાં રૂપે મળે, અને અંતે સમજાય, કે ભગવાન મળે કે ન મળે… પ્રેમ નો અનુભવ થવો જ, સૌથી મોટો દર્શન છે। . ભગવાન અને તું બને સરખા છે એ પણ મારી તારા પ્રત્યે ની લાગણી ન સમજી શક્યા અને તું પણ ના સમજી શકી.... @શબ્દો_ની_પાર✍️

Jitendra Singh

समय सबसे पहले हाथ थामता है, समय सबसे पहले साथ छोड़ता है।

Beyondwords

रहने दो अब… तुम मुझे पढ़ नहीं पाओगी, मैं बारिश में गलता हुआ एक आख़िरी कागज़ हूँ… जिस पर लिखी हर पंक्ति भीगकर धुँधली हो चुकी है, अब तो मेरा नाम भी पहचान में नहीं आता… तुम समझती तो बहुत कुछ थी, पर अब समझने को कुछ बचा ही कहाँ है… मैं पूरा का पूरा बरसात में घुल चुका हूँ। @beyond_word✍️

Beyondwords

ઘાઘરા ઝૂમે તો પવન પણ શરમાઈ જાય, તારું રૂપ જોતા ચાંદ પણ છુપાઈ જાય… 🌙 તૂ ફરતી જાય તો ધરતી રાસ રચે, પગલાં તારા રાતને સુગંધિત કરે હંમેશા… 💫 મારું દિલ ખોવાયું તારા નયનમાં, જાણે કાજલમાં આખું આકાશ સમાઈ ગયું… 🌌 તું હસે તો દીપક જળે દિલમાં હજારો, તું ચૂપ રહે તો પણ વાગે સંગીત વારંવાર… 🎶 એ સફેદ ઓઢણી, એ ગુલાબી અદા, મારું મન હંમેશા તારા રંગમાં રંગાયુ… 💞 હવે કોઈ પળો નહીં, કોઈ ફૂલો નહીં, ફક્ત તું, તારો સ્પર્શ, અને મારી આંખોમાં તારો જાદૂ રહી ગયો… ✨ @શબ્દો_ની_પાર✍️

archana

दिमाग… एक ऐसी प्रयोगशाला, जहाँ सिर्फ विचार नहीं, पूरी-पूरी दुनियाएँ जन्म लेती हैं। और जब यही दिमाग किसी लेखक का होता है, तो ये प्रयोगशाला और भी खास बन जाती है… लेखक का दिमाग कभी शांत नहीं रहता। वो हर पल कुछ सोचता है, कुछ गढ़ता है, कुछ महसूस करता है… कभी हँसी के दृश्य बनते हैं, कभी आँसुओं की कहानी, कभी एक मासूम किरदार जन्म लेता है, तो कभी एक दर्द भरी दास्तान। लेखक जब लिखने बैठता है, तो वो सिर्फ शब्द नहीं लिखता… वो अपने दिमाग की प्रयोगशाला में नए-नए प्रयोग करता है। सोचता है — आज कौन सा किरदार जन्म लेगा? कौन सी कहानी दिलों को छुएगी? क्या नया होगा, जो पहले कभी नहीं हुआ? कभी उसका दिमाग उसे आसमान तक ले जाता है, तो कभी धरती के सबसे गहरे दर्द तक… कभी वो कल्पना में उड़ता है, तो कभी हकीकत से लड़ता है। यही दिमाग की प्रयोगशाला है, जो मनगढ़ंत कहानियाँ भी बना सकती है, और सच्चाई को आईना भी दिखा सकती है। कभी यही दिमाग ओवरथिंकिंग में उलझ जाता है, पर यही उसकी ताकत भी है… क्योंकि जो ज्यादा सोचता है, वही कुछ नया रचता है। जैसे वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में नई खोज करता है, वैसे ही लेखक अपने दिमाग में नई दुनिया बना देता है। लेखक का दिमाग ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है… यहीं से शब्द जन्म लेते हैं, और शब्दों से कहानियाँ… और कहानियों से जुड़ती हैं भावनाएँ। यही प्रयोगशाला एक साधारण इंसान को “लेखक” बना देती है… और उसी लेखक के शब्द, किसी के दिल तक पहुँच जाते हैं। ✨

Imaran

मन करता है तुम्हें नजर में बसा लूँ, औरों की नजरों से तुम्हें बचा लूँ.. कहीं चुरा ना ले तुम्हें मुझसे कोई, आओ तुम्हें मैं अपनी धड़कन में छुपा लूँ 🤎💛imran 🤎💛

Gor Dimpal Manish

વિશ્વ કવિતા દિવસ આ નભ જેટલું વિશાળ મન, ને એમાં ઊંડા ભાવોના તરંગ. સમજાય નહીં તોય કહ્યા કરવું શબ્દોના ગૂંથણમા ભાવોના રંગ ગઝલ,ગીત કે કવિતા ને હાઈકુ કળા એ તો સંવેદના માનવીનો. જય શ્રી કૃષ્ણ શ્રી

kattupaya s

Good evening friends.. have a nice time

Tr. Mrs. Snehal Jani

નથી સીધાં વાક્યો મારામાં, છતાં વ્યકત કરું ઘણું. કોઈ રચે મને નાનકડી, તો કોઈ કરે લાંબી રચના. થોડામાં ઘણું કહેવાની ક્ષમતા મારી અજોડ. હાઈકુ, છંદ, ગઝલ, સોનેટ, શાયરી, કવિતા નામો મારા. જેવી કવિની ક્ષમતા, એવું મારું અસ્તિત્વ. હું છું વાતો ઘણી કરતી, લાગણીઓમાં વહેતી એક કવિતા. વિશ્વ કવિતા દિવસની સૌ કવિઓને શુભેચ્છાઓ💐

महेश रौतेला

भीगे नयनों की बातें हैं जो दुनिया में रहती हैं, कुछ हाथ पकड़ कर आती हैं कुछ पैर छू कर जाती हैं। *** महेश रौतेला

Raa

mere khud lagaye ped ke amble khane chalo

Kavyasharma

ठिक से दीदार भी न कर पाए उनका ‚ जिन्हें दिन भर निहरा करते थे ।।

Alfha production house

ch 9 (BEYOND CODE AND LIFE) WILL BE LIVE SOON WITH IN FEW DAYS. ​"To my readers and followers, I want to sincerely apologize for the lack of updates and new book chapters lately. Alfha Production House has been facing some significant financial and professional hurdles recently. Navigating these rejections and setbacks has taken a lot of time and energy to resolve. Thank you for your patience and understanding while I work through this—I can’t wait to get back to sharing more stories with you soon."

Siboniso BoyBoy Dlamini

Guys, I'm still pinching myself! 😮 My book is blowing up on Matrubharti with tons of downloads, ratings, and amazing reviews! 😱 I can't believe people are connecting with this almost true African story! 🌟 If you haven't checked it out yet, what are you waiting for? 👉 Go read it for FREE on Matrubharti and let me know what you think! Trust me, you won't regret it! 💥 #MustRead #AfricanStory #BookLovers https://www.matrubharti.com/kingmaboy35gmail.com255193

Dada Bhagwan

व्यावहारिक जीवन में ऐसा कहा जाता है कि हम भगवान के बच्चे हैं और आत्मा भगवान का एक अंश है। यदि सचमुच में हम भगवान के अंश हैं तो फिर आत्मा क्या है? आत्मा की अवस्थाएँ क्या हैं? आइए, जानते हैं आत्मा के बारे में पूज्यश्री दीपकभाई से। Watch here: https://youtu.be/diWyr3agnYU #spirituality #spiritualvideo #spiritualfacts #SOUl #DadaBhagwanFoundation

archana

“इल्ज़ाम सारे हम पर ही आए, और चालें वो चलते रहे…” 😌

Dimple Das

hello everyone what's up I hope you all are doing good ❣️❣️❣️❣️❣️❣️ Do show your support by subscribing to my YouTube channel . And soon I will be posting motivational quotes here as well 🌟🌟 https://youtube.com/@authordimple?si=HbE5kfLK86ZY4fx0

Raju kumar Chaudhary

स्याही से नहीं, दिल की धड़कनों से लिखता हूँ, हर कहानी में अपना एक हिस्सा रखता हूँ। कभी इश्क़, कभी संघर्ष, कभी सपनों की उड़ान, हर भाषा में बस जज़्बातों का ही बयान। अगर शब्दों में सुकून और तूफ़ान दोनों चाहते हो, तो Follow करिए… यहाँ हर रचना में आपका ही अरमान छुपा है। ✨https://chat.whatsapp.com/FOiOFZ11VTS7B1PIAe66kz

shree

એક અણધાર્યા મોડ પર, ભૂતકાળ સામે આવી ગયો, તેના હાથમાં અન્યનો સંગાથ ને હોઠે મધુર સ્મિત હતું, જાણે મારી જિંદગીનો જૂનો અધ્યાય, નવો અર્થ પામી ગયો. હૃદયના ધબકાર વધ્યા ને નજર સ્થિર થઈ ગઈ પળવાર, આચનક મળેલો એ આઘાત, મન ને મગજ હલાવી ગયો. એનો ઉમંગ, મારા એકાંત પર સવાલો અનેક મૂકી ગયો.🥺

shree

એક વળાંક પર એ જૂનો ચહેરો દેખાયો, જાણે મારો આખો ભૂતકાળ સામે આયો. ​સાથે એની મંગેતર ને હાથમાં એનો હાથ હતો, બંને બહુ ખુશ હતા, ​જોઈને એને આમ, મારું હૈયું થોડું હારી ગયું, કાલે પરીક્ષા છે ને મન મારું ક્યાંક ભટકી ગયું. ​વર્ષો પછી જોયો તો પણ એ જ જૂનો અંદાજ, પણ હવે એની ખુશીમાં મારો ક્યાં કોઈ સાદ? ​હવે આંસુ લૂછીને મારે પુસ્તકોમાં ખોવાવું છે, ભૂતકાળ ભૂલીને મારે મારા ભવિષ્યને સજાવવું છે.(2)

jihan

"તારી મજબૂરી " મારી એક ભૂલ ની સજા બની તારી મજબૂરી, આંખોને મારી હંમેશા માટે નમ બનાવી તારી મજબૂરી તારી સાથે ના મારો છીનવી જાય સમય તારી મજબૂરી , સારો એક પળ વીતવા માટે તરસાવે છે તારીમજબૂરી , મન ભરીને એક નજર માટે તડપાવે તારી મજબૂરી સ્મિતમાં પણ તારા વિરહ નું દરદુઃખ આંખમાં આંસુ આપે તારી મજબૂરી જાન ના સમજ છે તારા હેતને અણસમજ કેમકે તે સમજે છે તારે મજબૂરી એટલું જ માંગુ છું કે બસ ધીમે ધીમે પણ દૂર થઈ જાય તારી મજબૂરી ✍️ - jihan✍️

Sonam Brijwasi

Sangeeta si ho tum, suron ki pehchaan ho, Dil ke har kone mein basi ek muskaan ho, Tumse hi mehfil roshan ho jaati hai, Tum ho to har pal ek naya armaan ho… 🌸

Anup Gajare

"धपाक" ____________________________________________________ ढूंढते हुए पहुंचे थे अनंत की दीवारों में बनी सुरंग के रास्ते। एक गली जिसकी लंबी सड़क पर हर शाम कोई अपने पद के चाप पीछे छोड़ जाता। मंदिर में ठीक सात बजे गूंज उठती आरती की लय। घंटी के अनुवाद करना मुश्किल था सूक्ष्म कण सिमटे हुए थे हवाओं में। गरज़ते बादल तूफान बस थोड़ी देर पर रुका हुआ कोई मुसाफ़िर था। किसी देवता की आरती में खडे वह बस तालिया पीटते हुए कर रहा था प्रसाद का इंतजार। मंदिर चौंकानी हिस्से में प्रदक्षिणा करते हुए हर अणु घूम रहा था। इलेक्ट्रॉन हाथ ऊपर उठाते हुए प्रोटॉन को छूने की लगातार कोशिश करते रहे। आरती के मंत्र कानों में घूमते हुए अपनी लकीर खींच रहे थे। तभी वह विस्तृत विस्फोट हुआ पहले रौशनी दिखी थी या आवाज आई। न मालूम के बिच में फंसी भिड़ के किनारे वह अज्ञात खड़ा था। उसे पैदल ही अपना रास्ता प्राप्त करना था। अगली सुबह बारिश के चिन्ह प्रूफ के भीतर बसे थे। सड़क गिली हो चुकी थी और मंदिर का हर कोना अब खंडहर में तब्दील हो चुका था। कोई बोला बम फूटा लेकिन मैं जानता हु ये धमाका वही था जिससे विश्व का निरन्तर निर्माण हुआ। दुनिया सिकुड़ गई थी या फ़ैल रही थी बचे हुए हिस्से लेकर। वह धमाका सच था या वह रौशनी या आवाज। कोई ठीक से बोल न सका बस वजूद को उभरते हुए राख के नीचे दबी अस्थियों में जले शरीर उठाये जा रहे थे। बारिश के कुंद मौसम में ये क्या हुआ था इसका पता अबतक नहीं हुआ। राख अभी पूरी तरह ठंडी नहीं हुई थी उसमें कुछ अंगारे जैसे यादें धीरे-धीरे सांस ले रही थीं। वह अज्ञात भीड़ के छूटते किनारों से अंदर की ओर बढ़ा— जहाँ आवाजें अब नहीं थीं पर उनकी लहरें दीवारों से टकराकर वापस आ रही थीं। एक टूटी हुई घंटी मिट्टी में आधी दबी हुई अब भी हिल रही थी— किसी अंतिम स्पर्श की तरह। उसने हाथ बढ़ाया पर छुआ नहीं, जैसे उसे डर हो कि कंपन फिर शुरू हो जाएगा। हवा में तैरते कण अब भी गोल-गोल घूम रहे थे जैसे प्रदक्षिणा अधूरी रह गई हो और समय उसी चक्र में अटका हो। उसने ऊपर देखा— आसमान वैसा ही था या शायद थोड़ा और खाली। बादल जा चुके थे पर उनकी गूंज अब भी पसरी हुई थी हर उस जगह जहाँ कुछ था… और अब नहीं था। एक बच्चा राख के ढेर के पास बैठा अपनी उंगलियों से कुछ बना रहा था— शायद घर या शायद वही मंदिर। वह अज्ञात उसे देखता रहा काफी देर तक, जैसे पहली बार निर्माण को विनाश के बाद समझ रहा हो। “धपाक” फिर से कहीं भीतर हुआ— इस बार बिना आवाज के। उसे लगा कि इलेक्ट्रॉन अब भी प्रोटॉन तक पहुँचने की कोशिश में हैं पर दूरी पहले से थोड़ी और बढ़ गई है। या शायद वे मिल चुके हैं और वही मिलन यह सब बना रहा है। उसने कदम आगे बढ़ाया गीली सड़क पर अपना एक निशान छोड़ा— जो तुरंत ही पानी में घुल गया। जैसे कोई कभी था ही नहीं। पर फिर भी— कहीं किसी अदृश्य रजिस्टर में वह दर्ज हो चुका था। मंदिर अब नहीं था पर उसकी परिक्रमा अब भी चल रही थी हर उस कण में जो हवा में बचा रह गया था। वह अज्ञात अब भी चल रहा था— बिना किसी दिशा के पर शायद पहली बार किसी अर्थ की ओर। और पीछे राख के नीचे कुछ हड्डियाँ धीरे-धीरे धूल में बदल रही थीं— जैसे सृष्टि फिर से अपने पहले अक्षर लिख रही हो। _____________________________________________

Wow Mission successful

Eid Mubarak 😍🌺

Harsh Bhatt

On Yesterday night, I just realised why I'm so borring? I feel every time I leave every thing what I love and I wish for somebody's happiness and somebody's wish! " why I don't fight for that things?" That question hurt me every time and increase anger on myself that turned into self harming like portrait myself like joker. From now I just do what I want to do and what I wish to do and it's for only myself....

rakesh

: *नव संवत्सर* सावन बीता भादौ बीता, बीती रातें मावठ की, कण- कण में मस्ती छाई ,चली हवा बहारों की || उषा की लालिमा बनकर,आई भोर मतवाली, पंथी अपनी राहें भूले, फुल खिले हैं डाली -डाली || शान्त सरोवर लहरें शीतल,चहुँदिशि सुगंध बढ़ाए। साँझ ढली हंसों का जोड़ा, खुशियों की सौगात बढ़ाए || नहीं यहाँ घर-बार मेरा, न चाहत मेरी, हजारों की बुनियाद है | धरती पर लाया नव जीवन, किसने की फरियाद है || देख चुका मन कितने पतझर, अब छाई हरियाली है | मस्त मगन पौधे लहराये, जैसे बजी कहीं शहनाई है || मधुर - मधुर भौरों का गुंजन,खिला -खिला आकाश। इन्द्रधनुष सा नभ पर छाया, माधव बना प्रकाश।। फूलों की माला लेकर,चाँद आया धरती पर | उड़ते पंखेरू पनघट देखे,बादल या अंबर पर|| फूलों की दुनिया मे , झूमें पंछी कोयल गाये। सूरज की किरणे भी, हँसती धरा नहलाये।। टिमटिमाते ख़ुशी से तारे,रिमझिम-रिमझिम बूंदें आई | पेड़ों के पत्तों ने मिलकर झूम-झूमकर तालियांँ बजाईं || महक उठी चहके चिड़िया, भंवरे मतवाले मंडरा रहे हैं। फूलों से है सजी क्यारियाँ, मधुरस पीने को आ रहे हैं। *राकेश कुमार पंवार*

swarnima varshney

Words written from the heart, now reaching many hearts ❤️ Feeling blessed to be featured again in Dainik Jagran 📰✨

rakesh

*नव संवत्सर* सावन बीता भादौ बीता, बीती रातें मावठ की, कण- कण में मस्ती छाई ,चली हवा बहारों की || उषा की लालिमा बनकर,आई भोर मतवाली, पंथी अपनी राहें भूले, फुल खिले हैं डाली -डाली || शान्त सरोवर लहरें शीतल,चहुँदिशि सुगंध बढ़ाए। साँझ ढली हंसों का जोड़ा, खुशियों की सौगात बढ़ाए || नहीं यहाँ घर-बार मेरा, न चाहत मेरी, हजारों की बुनियाद है | धरती पर लाया नव जीवन, किसने की फरियाद है || देख चुका मन कितने पतझर, अब छाई हरियाली है | मस्त मगन पौधे लहराये, जैसे बजी कहीं शहनाई है || मधुर - मधुर भौरों का गुंजन,खिला -खिला आकाश। इन्द्रधनुष सा नभ पर छाया, माधव बना प्रकाश।। फूलों की माला लेकर,चाँद आया धरती पर | उड़ते पंखेरू पनघट देखे,बादल या अंबर पर|| फूलों की दुनिया मे , झूमें पंछी कोयल गाये। सूरज की किरणे भी, हँसती धरा नहलाये।। टिमटिमाते ख़ुशी से तारे,रिमझिम-रिमझिम बूंदें आई | पेड़ों के पत्तों ने मिलकर झूम-झूमकर तालियांँ बजाईं || महक उठी चहके चिड़िया, भंवरे मतवाले मंडरा रहे हैं। फूलों से है सजी क्यारियाँ, मधुरस पीने को आ रहे हैं। *राकेश कुमार पंवार*

archana

**“कुछ महीने पहले… मेरे बाल लगभग चले गए थे। आज छोटे-छोटे बाल वापस आए हैं… शायद किसी के लिए ये छोटी बात हो, पर मेरे लिए ये बहुत बड़ी जीत है। ❤️ हाँ, मेरा ट्रीटमेंट अभी भी चल रहा है… जैसे ही दवाई छोड़ती हूँ, वही परेशानी फिर लौट आती है— खुजली, बाल झड़ना, दर्द… डॉक्टर भी अभी पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं, पर मैं हार नहीं मानी हूँ। महंगी दवाइयाँ भी चल रही हैं, और साथ में लोगों के ताने भी— पर अब मैंने सीख लिया है, दर्द से लड़ना… चुप रहकर भी मजबूत रहना। मेरे बाल अभी थोड़े-थोड़े हैं, टूटते भी हैं… लेकिन हर नया बाल मुझे ये याद दिलाता है— मैं हार नहीं रही, मैं ठीक हो रही हूँ। ✨ एक दिन सब ठीक होगा… और मैं फिर से मुस्कुराऊँगी, पूरे आत्मविश्वास के साथ।”** ❤️

Shailesh Joshi

बर्फ जैसी सर्दि हो, आग जैसी गर्मी हो, या फिर हो जड़ से उखाड़ दे ऐसी हवाओं के साथ गिरती बारिश, ये सब कई सालों तक सहेने के बाद फिर कहीं जाकर, पेड़ पर फल फूल लगते हैं, क्योंकि...अच्छी फसल ऐसे ही नहीं खिलती, ठीक उसी तरह हर बुरे दिन, बुरे वक़्त से लड़ने के लिए खुद को तैयार रखना पड़ता है, पसंदीदा जिंदगी ऐसे ही नहीं मिलती. डटे रहेंना पड़ता है. - Shailesh Joshi

Narayan

भुलाना चाहूँ भी तो कैसे भुलाऊँ तुझे, तू वो याद है जो हर सांस के साथ आती है। - नारायण

Soni shakya

हमने तो पूरी शिद्दत से निभाई थी मोहब्बत, पर किस्मत को मंजूर नहीं था संग.. वह अधूरी सी कहानी आज भी जिंदा है, जिसमें मैं थी, तुम थे मगर नहीं था.. उस कहानी का कोई अंत..🍁 - Soni shakya

kajal jha

तेरी खामोशी में भी एक अजीब सा शोर है, जैसे हर लफ़्ज़ में छुपा कोई राज़ गहरा और है। तू पास होकर भी क्यों इतना दूर लगता है, शायद ये मोहब्बत नहीं… कोई अधूरा सा दौर है। - kajal jha

Sanjay Sheth

શબ્દોમાં રહે દિલ, દિલમાં રહે પ્રેમ, નાની નાની વાતોમાં છુપાયેલું છે હેમ। સવાર કહે ધીમે થી, “આજ નવું કંઈ કર”, ગઈકાલ ભૂલીને તું, ખુશીથી આગળ વધ। રસ્તો જો કઠિન હોય, તો ડરતો નહિ યાર, હિંમત રાખી આગળ વધ, જીત તારી તૈયાર। પ્રેમ સૌથી મીઠી વાત, ગુસ્સાથી દૂર રહેજે, હસીને બધાને મળજે, આનંદથી જીવતો રહેજે। કવિતા એટલે ભાવ, સરળ શબ્દોનો સંગ, ઓછા શબ્દોમાં કહી જાય, જીવનનો સારો રંગ। વિશ્વ કવિતા દિવસ ની હાર્દિક શુભકામના.

Narayan

बेवजह नहीं रोता कोई इश्क में ऐ दोस्त, जिसे खुद से बढ़कर चाहा हो, वो रुलाता ज़रूर है। - नारायण

MASHAALLHA KHAN

आप सभी को तहे दिल से ईद मुबारक . -MASHAALLHA

Riddhi Gori

जिंदगी के सफर में थकान बहुत हैं, अपनों के अपनों पर यहां इल्जाम बहुत है, शिकायतों का दौर देखता हूं तो थम सा जाता हूं, लगता है उम्र कम है और इम्तिहान बहुत है.! - Riddhi Gori💙🤍

archana

**"मेरी आवाज़ शायद इतनी अच्छी नहीं है, मेरी एडिटिंग भी परफेक्ट नहीं है… कैमरा भी साधारण है, इसलिए फिल्टर का सहारा लेना पड़ा। लेकिन… मेरे भाव सच्चे हैं ❤️ मैंने ये वीडियो दिल से बनाई है, अपनी मन की आवाज़, अपने एहसासों के साथ… ये मेरी पहली कोशिश है, तो अगर कहीं कमी रह जाए तो माफ़ कर देना 🙏 बस एक ही चाहत है… कि आप सबका प्यार और आशीर्वाद मिले, ताकि मैं और बेहतर बनती जाऊँ।"** ✨

Vrishali Gotkhindikar

. कविता .हल्ली..हे काय होवुन बसलय बघ... माझ्या आयुष्यातल्या..प्रत्येक..क्षणावर... तुझा कबजा झालाय....!!! सकाळी ऊठल्यापासुन...अगदी रात्री..झोपेपर्यंत... फक्त... तुझ्याच...आठवणी..... ..तु काय करत असशील...... ....तु काय बोलत असशील.. ....तु कोणत्या रुपात. कशी दिसत असशील.. ..तुझं रुप..तुझं वागणं..तुझं दिसणं..तुझे विचार.. ..पुरत..झपाटलय मला...या गोष्टीनी...!! तुझ्या विचारात..दिवस ..रात्रीचा..पत्ताच लागेना झालाय बघ..!! लोक म्हणतात..मी सार काही विसरतोय..हल्ली.. पण तुझे विचार..मात्र.. विसरतच... नाहीत ना...!!!! उद्या...आस्तित्वच..तुझं जर वजा झाल... माझ्या आयुष्यातुन....... तर काय होईल ग माझं..!!!!! .................व्रुषाली.. ******१२/१२/११

Vrishali Gotkhindikar

तुझ्या ..डोळ्यात... ...जगताना..तेच तेच जीवनाचे" गाणे..." ..कीती अडचणी..किती संकटांचे.".बहाणे..'. ...हरघडी तर अडवतात..नवे नवे" तराणे.." सारे,,सारे ..सहन करता करता..मन होते ग केविलवाणे.! ................................तरी पण तुला सांगु... ......................................खुशहाल मी रहातो. ................................जेव्हा" राणी" तुझ्या डोळ्यात मी पहातो..!! ,,काहीच होत नाही ग आपल्या,, मनासारख.. ..सदा वागायच..दुसर्याच्या..मनासारख.. हा काय म्हणेल..?याला काय वाटेल??..विचार कर करुन ..सगळी,..सगऴी..धडपड यातच जाते संपुन.. .....................................तरी पण तुला सांगु.. ...................................मनपसंत वागायला पहातो ..................................जेव्हा" राणी" तुझ्या डोळ्यात मी पहातो..!!! .पाहीलेली सुंदर ..सुंदर..स्वप्ने..डोळ्या समोर विरुन जातात.. ..भेटलेली...आणी ...आपलीशी वाटलेली माणस.. ..क्षणार्धात..परकी होवुन जातात..! .......................................तरी पण तुला सांगु.. ..................................पुन्हा पुन्हा नव्या जोमाने उभा रहातो ...................................जेव्हा" राणी" तुझ्या डोळ्यात मी पहातो!!! वृषाली **

Saliil Upadhyay

આ‌ વીકેન્ડ સારો જાય એટલે મેં મારી પત્નિને આજે સવારે ચા પીતાં થોડાક રોમેન્ટિક થતાં કહ્યું... ચા ખૂબ જ સરસ બની છે..આખા શરીરમાં તાજગી આવી ગઈ... માય ડાર્લિગ તું તો હજારમાં એક છે...એમ કહી એક ફ્લાઇંગ કીસ આપી...! તો કહે બાકીની ૯૯૯ કોણ છે એ કહો...! તાજગી અને રોમાંસની એક સાથે હવા નીકળી ગઈ...! તમને કહેવાય નહીં તમે તો તાળી પાડી ખડખડાટ હસવાના છો મને ખબર છે... હસતા રહો અને મસ્ત રહો

Vrishali Gotkhindikar

“सबब माझ्या वर खूप “जीव ..आहे तुझा माहीत आहे मला पण तुझ्या सबबी तर संपत च नाहीयेत सकाळी फोन केला तुला “वाजत च राहतो .. मग मेसेज येतो अग कीती गडबड सकाळची वेळ च नाही झाला फोन उचलायला दुपारी निवांत वेळी बोलावे वाट्ते पण .. तुझ्या त्या मिटींग्स तुझ्या ऑफिसचे प्रोब्लेम तुला तर डबा पण खायला वेळ नसतो संध्याकाळी मात्र उचलतोस तु फोन पण तुझा चिडलेला आवाज . अग कीती ट्राफिक आहे कसे बोलणार तुझ्याशी आतां . रात्रीचा वेळ तर फक्त तुझ्या “कुटुंबां साठीच असतो ना ..! रविवार असतो तसा निवांत .. पण सकाळ पासून तुझे मेसेज वर मेसेज असतात फक्त भाजी आणायला जातोय् . मुलांना क्लास ला सोडायचे आहे ........ दुपार तर माझ्याच हातून निसटून जाते संध्याकाळी .. आता पाहुणे आहेत मुलांना बाहेर घेवून जातोय आता वगैरे वगैरे मेसेज ..च फोन वर धडकत असतात असेच कीती तरी दिवस संपत असतात .. तुझ्या वर रागावत नाही मी कधीच .. पण आता मीच शोधतेय “सबब ..तुला फोन न करण्याची !! वृषाली

GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

मनुज अपयशी है अगर, मिले न उसको मान। वह जीवित है जगत में, पर वह मृतक समान।। दोहा --456 (नैश के दोहे से उद्धृत) -------गणेश तिवारी 'नैश'

N¡k¡t@

Rashtriya bhojan...just for knowledge..

SAYRI K I N G

एक बात तो अब तक समझ नहीं आई ये आयोडेक्स वाले लड़की की कमर क्यों दिखाते है हम लड़कों की कमर क्या सीमेंट से बनी है

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